Agriculture Export Policy

Agriculture Export Policy

 

वाणिज्य विभाग

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

भारत सरकार

विषय-वस्तु

 

1. प्रस्तावना

2. कृषि निर्यात नीति: उद्देश्य और विजन

3. वर्तमान कृषि व्यापार परिदृश्य

4. कृषि निर्यात नीति कार्यढांचे के तत्व

5. कार्यनीतिक सिफारिशें

5.1 नीतिगत उपाय

5.1.क. स्थिर व्यापार नीति शासन

5.1.ख. एपीएमसी अधिनियम में सुधार और मंडी शुल्क को सुव्यवस्थित करना

5.2 अवसंरचना एवं संभारिकी सहायता

5.3 निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल दृष्टिकोण

5.4 कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की व्यापक भागीदारी

5.4.क. कृषि निर्यात के संवर्धन के लिए एक नोडल राज्य विभाग/एजेंसी की पहचान

5.4.ख. राज्य निर्यात नीति में कृषि निर्यात संबंधी समावेशन

5.4.ग. कृषि निर्यात की सुविधा के लिए अवसंरचना एवं संभारिकी

5.4.घ. निर्यात में सहयोग करने के लिए राज्य स्तर और समूह स्तर पर संस्थागत तंत्र

6. संचालन संबंधी सिफारिशें

6.1 समूहों पर ध्यान दें

6.2 मूल्यवर्धित निर्यातों का संवर्धन

6.2.क. स्वदेशी वस्तुओं और मूल्यवर्धन के लिए उत्पाद विकास

6.2.ख. मूल्यवर्धित जैविक निर्यातों का संवर्धन

6.2.ग. आगामी बाजारों के लिए नए उत्पाद विकास हेतु अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों का संवर्धन

6.2.घ. कौशल विकास

6.3 "ब्रांड इंडिया" का विपणन एवं संवर्धन

6.4 उत्पादन और प्रसंस्करण में निजी निवेश आकर्षित करना

6.4.क. ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस (ईओडीबी) और डिजिटलीकरण

6.4.ख. सागर नयाचार का विकास करना

6.5 सशक्त गुणवत्ता शासन की स्थापना

6.5.क. घरेलू और निर्यात बाजार के लिए एकल आपूर्ति श्रृंखला और मानकों को स्थापित करना एवं बनाए रखना

6.5.ख. एसपीएस और टीबीटी प्रतिक्रिया तंत्र

6.5.ग. अनुरूपता मूल्यांकन

6.6 अनुसंधान और विकास

6.7 विविध

6.7 क - कृषि-स्टार्ट-अप निधि का सृजन

निष्कर्ष


 

 

संक्षिप्त रूप

 

एईपी - कृषि निर्यात नीति 

एईजेड - कृषि निर्यात क्षेत्र

एपीडा - कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण 

एपीएमसी - कृषि उपज विपणन समिति

आसियान - दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का संघ 

सीएजीआर - मिश्रित वार्षिक विकास दर

सीआईबी - केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड 

सीएनएसएल - केशू नट शेल लिक्विड 

सीपीसी - सेंटर फॉर पेरिशेबल कार्गो

सीएसआईआर - वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद

डीएसीएंडएफडब्ल्यू - कृषि विभाग, सहयोग और किसान कल्याण 

डीएएचडीएफ - पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग 

डीएआरई - कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग

डीएवाई-एनआरएलएम - दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन 

डीएफपीडी - खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग

डीओसीए - उपभोक्ता मामले विभाग 

डीजीएफटी - विदेश व्यापार महानिदेशालय

डीओसी - वाणिज्य विभाग

ईआईसी - निर्यात निरीक्षण परिषद

ईएफएसए - यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण

ई-एनएएम - इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार 

ईपीसी - निर्यात संवर्धन परिषद

ईयू - यूरोपीय संघ

एफएएमए - संघीय कृषि विपणन प्राधिकरण 

एफडीआई - प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

एफआईईओ – भारतीय निर्यात संगठन संघ 

एफओबी - फ्री ऑन बोर्ड

फॉरेक्स - विदेशी मुद्रा

एफपीओ - किसान उत्पादक संगठन

एफएसएसएआई - भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण

एफएसवीपीएस - पशु चिकित्सा और पादपस्वच्छता निगरानी के लिए संघीय सेवा (रोसेल खोज़नाज़ोर)

एफटीए - मुक्त व्यापार समझौता

जीएपी - अच्छी कृषि परिपाटियां 

जीसीसी - खाड़ी सहयोग परिषद 

जीडीपी - सकल घरेलू उत्पाद

जीआई - भौगोलिक संकेत 

जीएसटी - वस्तु और सेवा कर

एचपीएमसी - हिमाचल प्रदेश बागवानी उत्पादन विपणन और प्रसंस्करण निगम लि.

आईएआरआई - भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान 

आईबीईएफ - इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन

आईसीएआर - भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद

आईसीडी/सीएफएस - अंतर्देशीय कंटेनर डिपो/कंटेनर फ्रेट स्टेशन 

आईडीएमएफ - एकीकृत मत्स्य पालन विकास एवं प्रबंधन 

आईपी - बौद्धिक संपदा

आईक्यूएफ - व्यक्तिगत क्विक फ्रीजिंग 

आईटी - सूचना प्रौद्योगिकी

मार्कफेड - पंजाब स्टेट को-ऑप. सप्लाई एंड मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड 

एमईपी - न्यूनतम निर्यात कीमत

एमआईडीएच - एकीकृत बागवानी विकास मिशन 

एमओएफपीआई - खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय

एमपीईडीए - समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण 

एमआरएल - अधिकतम अवशेष सीमा

एमएसएमई - सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम

एनएबीएल - परीक्षण और अंशांकन प्रयोगशालाओं के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड 

एनपीओपी - जैविक उत्पादन संबंधी राष्ट्रीय कार्यक्रम

एनपीपीओ - राष्ट्रीय पौध संरक्षण संगठन 

एनएसएसओ - राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय

एनटीबी - गैर-शुल्क बाधाएं

पीएमके संपदा - कृषि-समुद्री प्रसंस्करण और कृषि-प्रसंस्करण समूहों के विकास के लिए प्रधानमंत्री किसान योजना

पीपीपी-आईएडी - एकीकृत कृषि विकास के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी 

आरएंडडी - अनुसंधान और विकास

आरएमपी - अवशेष निगरानी योजना 

एसईजेड - विशेष आर्थिक क्षेत्र 

एसएचजी - स्व सहायता समूह

एसपीएस – स्वच्छता एवं पादपस्वच्छता 

टीबीटी - व्यापार में तकनीकी बाधाएं

टीआईईएस – निर्यात योजना के लिए व्यापार अवसंरचना 

यूएई - संयुक्त अरब अमीरात

यूएस - संयुक्त राज्य अमेरिका

यूएस एफडीए – संयुक्त राज्य खाद्य एवं औषध प्रशासन 

यूएसडीए - संयुक्त राज्य कृषि विभाग

डब्ल्यूटीओ - विश्व व्यापार संगठन


 

 

कृषि निर्यात नीति

 

प्रस्तावना

 

भारत एक बड़े और विविध कृषि वाला देश है जो अनाज, दूध, चीनी, फलों और सब्जियों, मसालों, अंडे और समुद्री खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी उत्पादकों में से एक है। भारतीय कृषि हमारे समाज की रीढ़ बनी हुई है और यह हमारी लगभग 50 प्रतिशत आबादी को आजीविका प्रदान करती है। भारत विश्व की जनसंख्या का 17.84 प्रतिशत, पशुधन की 15% आबादी की सहायता करता है, जिसके पास विश्व की मात्र 2.4 प्रतिशत भूमि और 4 प्रतिशत जल संसाधन हैं। इसलिए, उत्पादकता, कटाई के पूर्व और बाद के प्रबंधन, प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन, प्रौद्योगिकी के प्रयोग और अवसंरचना निर्माण के लिए निरंतर नवाचार और प्रयास भारतीय कृषि के लिए अनिवार्य तत्व हैं। भारत में ताजे फल और सब्जियों, मत्स्य पालन पर विभिन्न अध्ययनों ने खराब कटाई के बाद के प्रबंधन, कोल्ड चेन की अनुपस्थिति और प्रसंस्करण सुविधाओं के कारण लगभग 8% से 18% तक नुकसान दर्शाया है। इसलिए, कृषि प्रसंस्करण और कृषि निर्यात एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है तथा यह संतोष की बात है कि कृषि उत्पादों के वैश्विक निर्यात में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2016 के विश्व व्यापार संगठन के व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत वर्तमान में विश्व के प्रमुख निर्यातकों में दसवें स्थान पर है। कृषि उत्पादों के वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी कुछ वर्ष पहले 1% से बढ़कर 2016 में 2.2% हो गई है।

 

हाल की विकास दर से पता चलता है कि घरेलू मांग में वृद्धि की तुलना में कृषि-खाद्य उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, और निर्यात के लिए अधिशेष की मात्रा में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। यह विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए विदेशी बाजारों पर कब्जा करने हेतु गुंजाइश और अवसर प्रदान करता है तथा उत्पादकों को कृषि उपज के लिए अधिक कीमतें अर्जित करने में सक्षम बनाता है।

 

2. कृषि निर्यात नीति: उद्देश्य और विजन

 

बढ़ती विवेकाधीन आय, बदलते खाद्य पैटर्न, विशाल कृषि क्षेत्र, विविध कृषि और कृषि पर भारी जनसंख्या की निर्भरता से 1.3 अरब उपभोक्ताओं वाले एक गतिशील राष्ट्र ने भारत को एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में और खाद्य उत्पादों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में विश्व के केंद्रीय मंच पर आगे बढ़ाया है। प्रायः यह सुझाव दिया गया है कि "मेक इन इंडिया" का एक आवश्यक तत्व "बेक इन इंडिया" होना है, अर्थात मूल्यवर्धन और प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों पर नए सिरे से ध्यान दिया जाना है। तेजी से बढ़ती वैश्विक आबादी और सिकुड़ते खेत, बदलते सामाजिक-आर्थिक, कृषि-जलवायु और आहार पैटर्न के साथ, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को यह पुनर्विचार करने के लिए चुनौती दी है कि हम 7.5 अरब वैश्विक नागरिकों को कैसे विकसित कर सकते हैं और उन्हें खिला सकते हैं। भारत की चाह, संधारणीय रूप से बढ़ने, बहुतायत से व्यापार करने और सौहार्दपूर्ण रूप से प्रगति करने की है। कृषि निर्यात, अगर अवसंरचना, संस्थागत बैक अप, पैकेजिंग, माल परिवहन और बाजार पहुंच द्वारा समर्थित आंतरिक उत्पादन प्रणाली से जुड़ा हो तो कृषि अर्थव्यवस्था को बदलने की स्थिति में होगा।

 

तथापि, चुनौतियां कम कृषि उत्पादकता से लेकर कमजोर अवसंरचना तक वैश्विक मूल्य अस्थिरता से लेकर बाज़ार पहुँच तक गंभीर हैं। वर्ष 2022 तक किसान की आय को दोगुना करने के लिए प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विजन को उत्पादन और उत्पादकता में सुधार करने के लिए मध्यस्थताओं की श्रृंखलाओं की आवश्यकता होगी, साथ ही उत्पादन लागत को किफायती बनाने के साथ-साथ कृषि उपज के लिए बेहतर कीमत वसूली अपेक्षित होगी। भारत में एक समर्पित कृषि निर्यात नीति की लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जाती रही है।

 

संघ और राज्य सरकार के संघीय एवं प्रशासनिक ढांचे के कारण वाणिज्य विभाग (डीओसी) के तहत एक समर्पित नीति की आवश्यकता बनती है। जबकि कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग (डीएसीएंडएफडब्ल्यू) और पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग (डीएएचडीएफ) उत्पादन, पूर्व फसल और किसान की आय बढ़ाने पर जोर देते हैं, खाद्य उद्योग मंत्रालय (एमओएफपीआई) मूल्यवर्धन, कटाई के बाद के नुकसान और रोजगार सृजन पर जोर देता है। दूसरी ओर, वाणिज्य विभाग, सभी क्षेत्रों में विदेशी व्यापार पर जोर देता है। भारत सरकार को एक स्थिर और पूर्वानुमानीय कृषि निर्यात नीति स्थापित करने की बढ़ती आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य निर्यातोन्मुख कृषि उत्पादन और प्रसंस्करण से लेकर परिवहन, अवसंरचना और बाजार पहुंच तक संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को सुदृढ़ करना है। कृषि निर्यात नीति को कृषि और अधिशेष कृषि उपज के लिए मौजूदा कार्यढांचे के साथ जोड़ा जाना है। एक ओर संधारणीय कृषि के लिए कार्यढांचे और दूसरी ओर व्यवहार्य कृषि निर्यात नीति के बीच एक सहजीवी संबंध है। एक नीति तैयार करने की आवश्यकता है जो महत्वपूर्ण निर्यात अवसरों के माध्यम से किसान की जेब में आय डालेगी।

 

कृषि निर्यात नीति कृषि निर्यातोन्मुख उत्पादन, निर्यात संवर्धन, बेहतर किसान वसूली और भारत सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के भीतर सिंक्रोनाइज़ेशन पर जोर देते हुए तैयार की जाती है। स्रोत पर ही मूल्यवर्धन के माध्यम से बेहतर आय के लिए "किसानों का केंद्रीकृत दृष्टिकोण" लेना आवश्यक है जो मूल्य श्रृंखला के नुकसान को कम करने में मदद करेगा। भारत को खाद्य सुरक्षा और दुनिया के एक प्रमुख कृषि निर्यातक के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किसानोन्मुख कार्यनीति की आवश्यकता है। यह नीति खाद्य प्रसंस्करण/विनिर्माण को खाद्य उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि करने के लिए बड़ा बल देगी जो वैश्विक स्तर पर अपने कृषि निर्यात हिस्से में मूल्यवर्धित प्रसंस्कृत उत्पादों में भारत का हिस्सा बढ़ाएगी। व्यापक उद्देश्य और विजन नीचे उल्लिखित किए गए हैं।

 

भारत की कृषि निर्यात नीति- उद्देश्य

 

  • वर्ष 2022 तक कृषि निर्यात को स्थिर व्यापार नीति शासन से वर्तमान ~ 30 यूएस डॉलर + बिलियन से ~ 60 यूएस डॉलर + बिलियन तक दोगुना करने के लिए और उसके बाद अगले कुछ वर्षों में 100 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुंचाना।
  • हमारे निर्यात हिस्से, लक्ष्यों को विविधीकृत करना और खराब होने वाली वस्तुओं पर जोर देने सहित उच्च मूल्य एवं मूल्यवर्धित कृषि निर्यातों को बढ़ावा देना।
  • नए, स्वदेशी, जैविक, जातीय, पारंपरिक और गैर-पारंपरिक कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना।
  • बाजार पहुंच को आगे बढ़ाने, बाधाओं से निपटने और स्वच्छता एवं पादपस्वच्छता मुद्दों से निपटने के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करना।
  • यथाशीघ्र वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण करके विश्व कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी को दोगुना करने का प्रयास करना।
  • विदेशी बाजार में निर्यात के अवसरों का लाभ पाने के लिए किसानों को सक्षम बनाना।

 

भारतीय कृषि निर्यात नीति-विजन

 

भारत को कृषि क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए उपयुक्त नीतिगत साधनों के माध्यम से भारतीय कृषि की निर्यात क्षमता तैयार करना।

 

3. वर्तमान कृषि व्यापार परिदृश्य

 

विश्व कृषि व्यापार मुख्य रूप से वैश्विक कीमतों में गिरावट के कारण पिछले पांच वर्षों (2013-2017) में अपेक्षाकृत रूप से स्थिर रहा है। तेल की कीमतों में तेज गिरावट का वैश्विक कृषि वस्तुओं की कीमतों में नरमी में प्रमुख योगदान था। तथापि, व्यापार की मात्रा में गिरावट नहीं आई जो वैश्विक बाजार में मजबूत मांग दर्शाती है। 2014-15 और 2015-16 के दौरान वैश्विक कीमतों में गिरावट और एक के बाद एक सूखे के प्रभाव के कारण भारत का कृषि निर्यात[1] वित्तीय वर्ष 2013 में 36 बिलियन अमेरिकी डॉलर से 5 प्रतिशत तक गिरकर वित्तीय वर्ष 17[2] में 31 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। तथापि, वर्ष 2016-17 में सामान्य उत्पादन से भारत का कृषि निर्यात तंग वैश्विक बाजार की स्थिति के बावजूद काफी ठीक हुआ है। भारत के दस साल के कृषि निर्यात का तुलनात्मक विश्लेषण उत्साहजनक तस्वीर दर्शाता है। भारतीय कृषि निर्यात में वर्ष 2007 और 2016 के बीच चीन (8%), ब्राज़ील (5.4%) और अमेरिका (5.1%) की तुलना में 9% की वृद्धि हुई। इस अवधि में, कॉफी, अनाज, बागवानी उपज का निर्यात दोगुना हो गया; जबकि मांस, मछली, प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात में तीन से पाँच गुना वृद्धि हुई। इसके बावजूद, भारत का कृषि निर्यात बहुत कम कृषि भूमि वाले थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों से कम है।

 

भारतीय कृषि आज हरित क्रांति के दौर की तुलना में संरचनात्मक रूप से भिन्न है। 1970 के दशक के प्रारंभ और नब्बे के दशक के उत्तरार्ध के बीच, भारत का वार्षिक कृषि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लगभग 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। इस आरंभिक अवधि के दौरान, विकास सुस्त था और यह व्यापक रूप से अनाज-केंद्रित था, गेहूं और चावल तक सीमित था। तथापि, वर्ष 2000 और 2014 के बीच, देश का कृषि उत्पादन 101 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर लगभग 367 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो मुख्य रूप से बागवानी, डेयरी, पोल्ट्री और अंतर्देशीय एक्वा-संस्कृति जैसे उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों द्वारा संचालित है। किसी भी अन्य देश के पास भारत की तरह अधिक विविध खाद्य और गैर-खाद्य कृषि आधार नहीं है और यह इस आशा को बनाता है कि भारत विश्व कृषि व्यापार में अग्रणी व्यापारी हो सकता है।

 

भारत का निर्यात हिस्सा चावल (6 बिलियन अमेरिकी डॉलर), समुद्री उत्पाद (5.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर), और मांस (4 बिलियन अमेरिकी डॉलर) तक एक विविध मिश्रण है, जो कुल कृषि निर्यात[3] का ~ 52% बनता है। यद्यपि भारत उपर्युक्त कृषि उत्पादों के वैश्विक व्यापार में एक अग्रणी स्थान पर है, तथापि इसका कुल कृषि निर्यात हिस्सा विश्व कृषि व्यापार का 2% से अधिक है, जो अनुमानित रूप से 1.37 ट्रिलियन[4] अमेरिकी डॉलर है। भारत की इन आवक दिखने वाली नीतियों का एक महत्वपूर्ण कारण बड़े पैमाने पर खाद्य सुरक्षा और कीमत स्थिरीकरण है।

 

भारत वैश्विक कृषि निर्यात मूल्य श्रृंखला के निचले हिस्से पर रहा है, क्योंकि इसके अधिकांश निर्यात कम मूल्य, कच्चे या अर्ध-प्रसंस्कृत और थोक में विपणन किए जाने वाले हैं। भारत के उच्च मूल्य और मूल्यवर्धित कृषि उत्पाद[5] के कृषि निर्यात हिस्से में हिस्सेदारी अमेरिका में 25% और चीन[6] में 49% की तुलना में 15% कम है। भारत गुणवत्ता, मानकीकरण में एकरूपता की कमी और मूल्य श्रृंखला में घाटे को कम करने में असमर्थता के कारण अपने भारी बागवानी उत्पादों का निर्यात करने में असमर्थ है। मूल्य श्रृंखलाओं के वैश्वीकरण को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि देश उच्च मार्जिन, मूल्यवर्धित और ब्रांडेड प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सघन प्रयास करे। इस नीति से विदेशी बाजार की प्राथमिकताओं के अनुसार लक्षित निर्यात के लिए घरेलू मांग को पूरा करने के बाद अवशिष्ट निर्यात से एक बदलाव होगा।

 

वर्तमान वैश्विक और भारतीय व्यापार के आधार पर शीर्ष निर्यात योग्य कृषि वस्तुओं और उत्पादों की पहचान की जाएगी। प्रत्येक वस्तु का अध्ययन पांच प्रमुख मानदंडों के आधार पर विस्तार से किया जाएगा: वैश्विक व्यापार, पांच वर्षीय प्रभाव क्षमता, भारत की वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मकता, मूल्य वृद्धि की गुंजाइश और भविष्य के बाजार की क्षमता। लगभग दस वस्तुओं को विशिष्ट खेत, अवसंरचना और बाजार मध्यस्थता के लिए वस्तुओं के रूप में चुना जाएगा।

 

प्रारंभिक विश्लेषण इनके लिए बहुत अधिक संभावनाएं दर्शाता है: चिंराट, मांस, बासमती और गैर-बासमती चावल, अंगूर, केला, अनार, आलू सहित सब्जियां, प्रसंस्कृत/मूल्यवर्धित उत्पाद, काजू, हर्बल दवाईयों, खाद्य आधारित न्यूट्रास्यूटिकल्स, एरोमेटिक्स, मसाले (जीरा, हल्दी, काली मिर्च), एथनिक और ऑर्गेनिक फूड सहित मूल्यवर्धित रूपों में पौधों के भाग/औषधीय पौधे जड़ी-बूटियां।

 

[1] एचएस कोड अध्याय 1-23

[2] स्रोत: डीजीसीआईएस

[3] आंकड़े 2016-17 से संबंधित हैं, स्रोत: डीजीसीआईएस


[4] स्रोत: आईटीसी (अध्याय 1-23)

[5] एचएस कोड अध्याय 7,8,16,20,21

[6] स्रोत: आईटीसी

4. कृषि निर्यात नीति कार्यढांचे के तत्व

इस रिपोर्ट में नीतिगत सिफारिशें दो व्यापक श्रेणियों कार्यनीतिक और प्रचालनात्मक में संगठित की गई हैं। कृषि निर्यात नीति की मुख्य विशेषताएं नीचे दी गई हैं और उन पर बाद में उप-वर्गों में अधिक विस्तार से चर्चा की गई है।

 

 

कार्यनीतिक

नीति के उपाय

अवसंरचना और संभारिकी सहायता

निर्यात को बढ़ावा देने के लिए समग्र दृष्टिकोण

कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की अधिक भागीदारी

 

 

 

 

प्रचालनात्मक

समूहों पर जोर

मूल्यवर्धित निर्यात को बढ़ावा देना

"ब्रांड इंडिया" का विपणन और संवर्धन

उत्पादन और प्रसंस्करण में निजी निवेश आकर्षित करना

मजबूत गुणवत्ता व्यवस्था की स्थापना

अनुसंधान एवं विकास

विविध

 

5. कार्यनीतिक सिफारिशें

 

5.1 नीतिगत उपाय: कृषि मूल्य श्रृंखला में सार्वजनिक और निजी हितधारकों के साथ विचार-विमर्श में कुछ संरचनात्मक परिवर्तनों का उल्लेख किया गया जो कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक थे। इनमें सामान्य एवं वस्तुविशिष्ट दोनों उपाय शामिल हैं, जिन्हें तत्काल और कम से कम वित्तीय लागत के लिए लिया जा सकता है। तथापि, इसके बाद के लाभ, बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

 

5.1.क. स्थिर व्यापार नीति शासन: कुछ कृषि वस्तुओं की घरेलू कीमत और उत्पादन की अस्थिरता को देखते हुए, मुद्रास्फीति को कम करने के अल्पकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक साधन के रूप में व्यापार नीति का उपयोग करने की प्रवृत्ति रही है। इस तरह के परिस्थितिजन्य उपाय प्रायः उत्पाद और क्षेत्र विशिष्ट होते हैं, उदाहरण के लिए, प्याज और गैर-बासमती चावल के निर्यात के लिए तदर्थ प्रतिबंध अथवा न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) लागू करना। यह निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं को तोड़ता है और भारतीय उत्पाद के लिए कीमत वसूली प्रभावित करते हुए विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं के रूप में भारत की छवि को प्रभावित करता है। देश को उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों के स्रोत के रूप में देखा जाता है और घरेलू कीमतों में उतार-चढ़ाव के आधार पर निर्यात व्यवस्था में बदलाव, धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वास में दीर्घकालिक नतीजे हो सकते हैं।

 

इस तरह के उपायों के लिए लगातार अच्छे ताल-मेल की आवश्यकता होती है और यह बाजार को उत्सुक रखता है जो प्रायः कीमतों को झटका देता है। यद्यपि ये निर्णय घरेलू मूल्य स्थिरता को बनाए रखने के तत्काल उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं, तथापि वे दीर्घकालिक और विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत की छवि को विकृत करते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सकारात्मक संकेत भेजने के लिए सीमित सरकारी हस्तक्षेप के साथ एक स्थिर और पूर्वानुमानिय नीति बनाना अनिवार्य है। निर्यात के लिए बने उत्पादों और घरेलू खपत के लिए उत्पादन के बीच अंतर करने से बचना आवश्यक है। ऐसा करने का एक तरीका यह तय करना है कि निर्यात प्रतिबंध/प्रतिबंधों का केवल दुर्लभ परिस्थितियों में ही उपयोग किया जाएगा। यह विदेशी बाजार के योजना बनाने हेतु किसान को कुछ आत्मविश्वास प्रदान करेगा। ये नीतिगत उपाय किसानों को आत्मविश्वास के साथ बाजार संकेतों के अनुरूप चलने का आश्वासन दें और उन उत्पादों की ओर ले जाएं जो उच्च लाभ अर्जित करें।

 

कृषि निर्यात नीति का उद्देश्य इस प्रकार है:

 

1) यह आश्वासन प्रदान करना कि प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद और सभी प्रकार के जैविक उत्पाद किसी भी तरह के निर्यात प्रतिबंध (अर्थात न्यूनतम निर्यात मूल्य, निर्यात शुल्क, निर्यात प्रतिबंध, निर्यात कोटा, निर्यात कैपिंग, निर्यात परमिट आदि) के दायरे में नहीं लाये जाएंगे, भले ही प्राथमिक कृषि उत्पाद या गैर-जैविक कृषि उत्पाद को कुछ प्रकार के निर्यात प्रतिबंधों के तहत लाया जाए।

2) ऐसी कुछ वस्तुओं की पहचान जो संबंधित हितधारकों और मंत्रालयों के परामर्श से खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। अत्यधिक मूल्य स्थिति के तहत ऐसी पहचान की गई वस्तुओं पर कोई भी निर्यात प्रतिबंध उच्च स्तरीय समिति के निर्णय के आधार पर होगा। साथ ही, उपरोक्त पहचान की गई वस्तुओं पर किसी भी प्रकार के निर्यात निषेध और प्रतिबंध डब्ल्यूटीओ के संगत तरीके से उठाए जाएंगे।

3) मूल्य संवर्धन और पुनः निर्यात के लिए कृषि उत्पादों का उदारीकृत आयात।

 

5.1.ख. एपीएमसी अधिनियम में सुधार और मंडी शुल्क को सुव्यवस्थित करना: सभी राज्यों में कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम इन अधिनियमों में परिकल्पित किसानों के कल्याण को हासिल नहीं कर पाए हैं। कुछ एपीएमसी मार्केट यार्ड या मंडियां, जिनमें अदक्षता और व्यवसायी समूहन हुआ है, एक विशेष स्थिति की हैं। दशकों से किसानों को अपनी उपज को आधिकारिक बाजार यार्ड में बेचने के लिए मजबूर किया गया है जो सर्वोत्तम पारिश्रमिक कीमतों की पेशकश कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं। एपीएमसी का एकाधिकार निजी व्यापारियों को बाजार स्थापित करने और बाजार अवसंरचना में निवेश करने से रोकता है।

 

वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के बाहर रह गए बाजार शुल्क, अर्थीय आयोग और अन्य प्रभार राज्य (और स्थानीय निकायों) के दायरे में रहते हैं। विभिन्न राज्य मंडी खरीद (बासमती चावल - पंजाब 4%, हरियाणा 4%, दिल्ली- 1%; दलहन - महाराष्ट्र 1%, यूपी 2.5%; सोया डी-ऑइल केक- महाराष्ट्र 0.85%, मध्य प्रदेश 2.2%) पर अलग-अलग शुल्क लेते हैं ।

 

कुछ राज्यों ने मॉडल एपीएमसी अधिनियम को अपनाया है और फलों एवं सब्जियों को अन-अधिसूचित करने के लिए संशोधन किए हैं। इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-एनएएम) की स्थापना सही दिशा में एक कदम है। गुणवत्ता मापन, अवसंरचना और विवाद निपटान तंत्र से ई-एनएएम को अधिक अधिकार मिलेगा। वित्त मंत्री ने 2018-19 के लिए बजट पेश करते हुए 22,000 ग्रामीण बाजारों की घोषणा की है, जो किसानों को खरीदने और बेचने के निर्णय वाले विनियमों के अध्यधीन रहे बिना अपनी उपज बेचने के लिए लचीलापन की अनुमति देगा।

 

कृषि निर्यात नीति का उद्देश्य विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) क्षेत्रीय कार्यालय, निर्यात संवर्धन परिषद, वस्तु बोर्ड एवं उद्योग संघ का प्रयोग को सभी राज्यों द्वारा सुधार के लिए एक वकालत मंच के रूप में करने के लिए है। राज्य सरकारों के साथ उनके एपीएमसी अधिनियम से खराब होने वाली वस्तुओं को हटाने के लिए प्रयास जारी रहेंगे। राज्य सरकारों से भी बड़े पैमाने पर निर्यात किए गए कृषि उत्पादों के लिए मंडी करों को मानकीकृत/तर्कसंगत बनाने का आग्रह किया जाएगा। सभी राज्यों में मंडी/कृषि शुल्क का सरलीकरण या एकरूपता एक पारदर्शी आपूर्ति श्रृंखला बनाएगी जो किसान को सशक्त बनाएगी, उसे बाजारों तक व्यापक पहुंच प्रदान करेगी और पूरे देश में मुक्त व्यापार को सक्षम बनाएगी।

 

5.2 अवसंरचना और संभारिकी

 

मजबूत अवसंरचना की मौजूदगी एक मजबूत कृषि मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण घटक है। इसमें पूर्व-कटाई और कटाई के बाद की सार-संभाल सुविधाएं, भंडारण और वितरण, प्रसंस्करण सुविधाएं, सड़कें और तेजी से व्यापार की सुविधा वाले बंदरगाहों पर विश्व स्तरीय निकास बिंदु अवसंरचना शामिल हैं। मेगा फूड पार्क, अत्याधुनिक परीक्षण प्रयोगशालाएं और एकीकृत कोल्ड श्रृंखलाएं ऐसे मूल तत्व हैं, जिन पर भारत अपने कृषि निर्यात को बढ़ा सकता है। अधिकांश खाद्य उत्पादों के लिए खराब होने वाली प्रकृति और कड़े आयात मानकों को देखते हुए, कृषि  के लिए दक्ष एवं समय संवेदी सार-संभाल कृषि वस्तुओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

 

पूरी मूल्य श्रृंखला में मौजूदा निर्यातोन्मुख अवसंरचना का एक व्यापक जरूरत-अंतर विश्लेषण किया जाएगा। बंदरगाह आर्थिक विकास के लिए एक वाहन हैं। फिर भी, जबकि बंदरगाह विकास वास्तव में निर्यात में सुधार करेगा, यह आपूर्ति, गुणवत्ता, सार-संभाल और कनेक्टिविटी बढ़ने तक कृषि व्यापार को एक अपवादात्मक बढ़ावा नहीं देगा। अतः कार्यनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समूहों की पहचान करना, 24x7 सीमा शुल्क निकासी के साथ बंदरगाहों पर समर्पित कृषि अवसंरचना के साथ अंतर्देशीय परिवहन संपर्क बनाने से तेजी से व्यापार वृद्धि दीर्घकाल तक चलेगी। अतः निम्नलिखित पर जोर होगाः

 

  • उन प्रमुख बंदरगाहों की पहचान करें जहां वर्तमान/अनुमानित थोक और कंटेनर कृषि यातायात अवसंरचना और आधुनिकीकरण की पहलों की मांग करते हैं।
  • समद्री बंदरगाह – समर्पित खराब होने वाली बर्थ, कृषि जेटी का विकास;
  • कृषि उत्पादों को संभालने के लिए स्टेशनों पर रेलवे-अवंसरचना, रेफर वैगन;
  • हवाई अड्डा - बंदरगाहों पर मौजूदा निष्क्रिय अवसंरचना जैसे पेरिशबल कार्गो केंद्र (सीपीसी) के प्रचालन की चुनौतियों और नए सीपीसी की आवश्यकता, लोडर, नामित और पर्याप्त संगरोध क्षेत्रों, बेहतर हर्नलैंड कनेक्टिविटी की आवश्यकता की पहचान करना।

 

यह प्रायः उल्लेख किया जाता है कि संभारिकी सार-संभाल के निमित्त खर्च निर्यात लागत के लगभग 14 से 15% है। कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में 8 से 9% के निमित्त बेंचमार्क, बेहतर संभारिकी के कारण बचत भारतीय कृषि निर्यात को वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धी बना सकती है। यह कृषि निर्यात नीति का प्रयास होगा कि विभिन्न उत्पादों का सामना करने के लिए संभारिकी अड़चनों को संकलित किया जाए और वाणिज्य विभाग में नए बनाए गए संभारिकी प्रभाग, उसी तरह के विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों के साथ काम किया जाए ताकि इस तरह की अड़चनों की पहचान की जा सके और उन्हें दूर किया जा सके।

 

5.3 निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल दृष्टिकोण

 

कृषि निर्यात आपूर्ति पक्ष कारकों, खाद्य सुरक्षा, प्रसंस्करण सुविधाओं, अवसंरचना की बाधाओं और कई विनियमों द्वारा निर्धारित हैं। इसमें डीएसीएंडएफडब्ल्यू, डीएएचडीएफ, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई), कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई)/ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), एमओएफपीआई, जहाजरानी और परिवहन मंत्रालय, रेल मंत्रालय, नागर विमानन मंत्रालय उपभोक्ता मामले विभाग (डीओसीए), खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डीएफपीडी) सहित कई मंत्रालय शामिल हैं। कुल मिलाकर, राज्य सरकारों द्वारा संभाले गए कई अवसंरचना संबंधी मुद्दे कृषि निर्यात पर भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभाव डालते हैं।

 

कृषि निर्यात नीति में निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में विशेष प्रयास करने के लिए कृषि उत्पादन से संबंधित महत्वपूर्ण संगठन शामिल होंगे। कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को निर्यातोन्मुख प्रौद्योगिकी लेने और निर्यात संभावनाओं के बारे में किसानों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए शामिल होंगे। 

 

हितधारकों ने प्रायः संबंधित मंत्रालयों के एक असंबद्ध, एकल-मत वाले जनादेश की बात की है जो घरेलू कृषि उत्पादन और वैश्विक व्यापार को सफलतापूर्वक प्रभावित करने की उनकी क्षमता को प्रतिबंधित करता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अवसर घरेलू किसानों के फसल और खेती के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; ग्वार, चावल, दाल और तिलहन इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। समान रूप से, देश की कृषि उत्पादन की स्थिति किसी देश के कृषि और खाद्य आयात तथा निर्यात को प्रभावित करती है। संयुक्त राज्य अमेरिका खाद्य और औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए)/संयुक्त राज्य अमेरीका कृषि विभाग (यूएसडीए), संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ के क्रमशः पशु चिकित्सा और पादप संबंधी निगरानी (एफएसवीपीएस) और यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (ईएफएसए) के लिए रूस और यूरोपीय संघ को प्रायः विशिष्ट संघटनों के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में उल्लिखित किया जाता है जो कृषि उत्पादन और व्यापार दोनों से संबंधित नीतियों को बनाने, विनियमित करने और कार्यान्वित करने के लिए अधिकृत है। भारत में समान एजेंसियों के लिए काम करना लाभकर हो सकता है जिनमें कृषि-खाद्य उत्पादन और व्यापार के सभी पहलुओं को एक प्रभावी और सुव्यवस्थित तरीका शामिल होता है।

 

कीटनाशक और रासायनिक अवशेष भारतीय कृषि निर्यात के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण हैं। भारतीय खाद्य निर्यात को कभी-कभी अवशेषों के कारण खारिज कर दिया जाता है जो आयातक राष्ट्रों के अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) से अधिक हैं। बासमती से अंगूर से लेकर मूंगफली तक - सूची लंबी है। रसायनों के विवेकपूर्ण और समय पर उपयोग के बारे में भारतीय किसानों में जागरूकता की कमी एक प्रमुख बाधा रही है। इसे बढ़ाने के लिए किसान कई कीटनाशकों का उपयोग कर सकते हैं, जिनकी अन्य राष्ट्रों में अनुमति नहीं है या उन्हें तेजी से प्रतिबंधित नहीं किया जा रहा है। यूरोपीय संघ का हालिया कदम बासमती चावल में 1 पीपीएम से 0.01 पीपीएम तक ट्रिसाइक्लाजोल के एमआरएल को काफी कम करने का एक मामला है। इसे अत्यधिक लागत प्रभावी और किसान हितैषी माना जाता है, ट्रिसाइक्लाजोल का पूरे भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। अगर भारतीय चावल निर्यातकों को किसान जागरूकता और कृषि इनपुट स्विच कार्यक्रम लागू करना था, तो यह डीएसीएफडब्ल्यू और वाणिज्य विभाग के साथ मिलकर किया जाना सबसे अच्छा होगा। इसके अलावा, चूंकि कृषि और भूमि राज्य के विषय हैं, इसलिए राज्य सरकारों को अपने पर चलना होगा। गुणवत्ता नियंत्रण खेत स्तर पर – आगे बढ़ते हुए सबसे अच्छा हो सकता है, यह स्पष्ट है कि उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए मंत्रालयों में कार्यनीतिक और प्रचालनात्मक तालमेल महत्वपूर्ण होगा।

 

सरकार का समग्र दृष्टिकोण (क) उन्नत किस्म की अनुसंधान एवं विकास, मूल्यवर्धन तथा पैकेजिंग, (ख) अच्छी मानक व्यवस्था की स्थापना, (ग) स्वच्छता और पादपस्वच्छता (एसपीएस) के प्रति अनुकूल प्रतिक्रिया तथा व्यापार के लिए तकनीकी बाधाएं (टीबीटी), जो भारतीय उत्पादों के सामने आ रही हैं, (घ) विजेता क्षेत्रों की पहचान और उन क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाने के लिए कार्यनीतियों के मुद्दों को हल करेगा। ये मुद्दे कार्यनीतियों के प्रचालनात्मक भाग में आगे विस्तार से बताए गए हैं।

 

5.4 कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की व्यापक भागीदारी

 

वर्ष 1919 से, जब मोंटफोर्ड सुधारों ने इसे 'प्रांतीय' विषय घोषित किया, तब से भारत में कृषि को एक राज्य विषय होने का गौरव प्राप्त हुआ है और स्वतंत्रता के बाद, जब संविधान का प्रारूप तैयार किया गया था तब यह एक "राज्य" विषय बन गया। जबकि केंद्र सरकार धनराशि की सलाह दे सकती है तथा आवंटन कर सकती है, खेत और बाजार की अवसंरचना सुधार का समुचित कार्यान्वयन राज्य सरकारों के इशारे पर होता है।

 

प्रत्येक राज्य के पास प्राथमिकताओं, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं और कृषि बारीकियों का अपना सेट होता है जिसे वे राष्ट्र के व्यापक लक्ष्यों के साथ मिलाने का प्रयास करते हैं। वास्तव में, प्रत्येक राज्य में एक अलग (और प्रायः कई) कृषि-जलवायु क्षेत्र होते हैं जिनमें अलग-अलग फसल पैटर्न होते हैं और वे अत्यधिक विसंगतियों प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित होते हैं; भारत के एक हिस्से में सूखा हो सकता है जबकि दूसरे में बाढ़ आ सकती है। इसके अलावा, "व्यापार और वाणिज्य" संघ सूची में हैं और राज्यों को प्रायः देश के कृषि निर्यात में खुद के लिए कोई औपचारिक भूमिका नहीं दिखाई देती है।

 

राज्य स्तर पर कृषि निर्यात की सुविधा के लिए आए कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:

 

5.4.क. कृषि निर्यात के संवर्धन के लिए एक नोडल राज्य विभाग/एजेंसी की पहचान: कई राज्यों में, या तो उद्योग विभाग, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विभाग या वाणिज्य और उद्योग विभाग निर्यात संवर्धन के लिए नोडल विभाग के रूप में पहचाने जाते हैं तथा फलस्वरूप कृषि निर्यातों के संबंध में जोर खत्म हो गया है। राज्य की निर्यात क्षमता और स्वायत्त निकायों के पास उपलब्ध संसाधनों की गुणवत्ता के आधार पर, या तो विभाग या राज्य सरकार की किसी एजेंसी को कृषि निर्यात के लिए एक नोडल निकाय के रूप में घोषित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में, महाराष्ट्र राज्य कृषि विपणन बोर्ड, कर्नाटक में, कर्नाटक राज्य कृषि उत्पादन प्रसंस्करण और निर्यात निगम लिमिटेड, गुजरात में, गुजरात राज्य कृषि विपणन बोर्ड आदि निर्यात को सुकर बनाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और इन संगठनों को कृषि निर्यात संवर्धन के लिए एक प्रमुख निकाय के रूप में माना जा सकता है। इस नोडल एजेंसी का कार्य हितधारकों के साथ बने रहना, आधारभूत संरचना और संभारिकी अड़चनों की पहचान करना, निर्यातकों के सामने आने वाले मुद्दों को हल करने के लिए राज्य सरकार के अंतर्गत विभिन्न विभागों के साथ संपर्क करना, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और एजेंसियों द्वारा संचालित योजनाओं की पहचान करना और राज्य सरकारों के लिए आबंटन को अधिकतम करना, विदेशों से क्रेता प्राप्त राज्य स्तर पर क्रेता-विक्रेता सम्मेलन आयोजित करना, संगत अंतर्राष्ट्रीय मेलों में प्रतिभागिता के लिए राज्य स्तरीय निर्यातकों को प्रोत्साहित करना आदि होगा। वे एसपीएस और टीबीटी मुद्दों पर राज्य और केंद्र के बीच एक प्रभावी एवं प्रकार्यात्मक सूचना साझा तंत्र सृजित करने के लिए भी कार्य करेंगे। वाणिज्य विभाग राज्य स्तर पर ऐसी नोडल एजेंसी के क्षमता निर्माण, समर्थन और संचालन में सक्रिय भूमिका निभाएगा।

 

5.4.ख. राज्य निर्यात नीति में कृषि निर्यात संबंधी समावेशन: कई राज्य सरकारें निर्यात नीति लेकर आई हैं और कृषि निर्यात पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। एपीएमसी अधिनियम में नीतिगत बदलाव लाना, अंतर्देशीय और समुद्री मत्स्य पालन के लिए केज कल्चर के लिए नीति लाना, अच्छी कृषि परिपाटियों (जीएपी)/इंडजीएपी को बढ़ावा देना, गुणवत्ता आश्वासन प्रणाली पर काम करना, आगे मूल्य वृद्धि के लिए पूर्व और बाद के फसल अवसंरचना के निर्माण की योजना बनाना, मूल्यवर्धन और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहित करना, आदि को राज्य की निर्यात नीति के हिस्से के रूप में शामिल किया जा सकता है।

 

देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में उत्पाद विशिष्ट समूहों को विकसित करने के एक दृष्टिकोण से विभिन्न आपूर्ति पक्ष के मुद्दों, यथा - मिट्टी के पोषक तत्वों के प्रबंधन, उच्च उत्पादकता, फसल की बाजारोन्मुख किस्म को अपनाने, अच्छी कृषि परिपाटियों के उपयोग आदि से निपटने में मदद मिलेगी। किसानों के साथ प्रसंस्करणकर्ताओं/निर्यातकों का एकीकरण बेहतर आय और स्थिर बाजार सुनिश्चित करेगा। राज्य सरकारें ऐसे समूहों की पहचान कर सकती हैं जिनके पास निर्यात की उच्च संभावना है और उन समूहों से निर्यात की सुविधा के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ काम करतीं हैं।

 

5.4.गकृषि निर्यात की सुविधा के लिए अवसंरचना एवं संभारिकी: प्रमुख कृषि क्षेत्रों में राज्य की क्षमता का आकलन और अवसंरचना के निर्माण के समर्थन के लिए कार्य योजना तैयार करना निर्यात को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण होगा। उदाहरण के लिएतटीय राज्यों में, अत्याधुनिक फिश लैंडिंग केंद्रोंउच्च गुणवत्ता वाले मछली पकड़ने के बंदरगाहोंपूर्व-प्रसंस्करण सुविधाओं आदि का सृजन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी प्रकारखराब होने वाली वस्तुओं के लिए कोल्ड चेन सुविधाओं की एक श्रृंखला का निर्माणवाष्प ताप उपचार का निर्माण और विशिष्ट बाजारों को निर्यात को सक्षम करने के लिए विकिरण की सुविधा आदि कुछ ऐसी मध्यस्थताएं हैं जिन्हें राज्य सरकारों द्वारा शुरू करने की आवश्यकता है। संभारिकी पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता संबंधी मुद्दे उदाहरण के लिए, कई एयर कार्गो कंपनियों को अभी तक अधिकांश प्रमुख भारतीय हवाई अड्डों में लैंडिंग शेड्यूल की अनुपलब्धता के कारण अपनी पूरी क्षमता हासिल करना बाकी है जो स्मार्ट कार्गो हैं। इसी प्रकार एटीएफ ईंधन पर लैंडिंग शुल्क/पार्किंग शुल्क और शुल्क कम करना ताजा/अत्यधिक खराब/प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए लागत प्रभावी होगा। अवसंरचना की बाधाओंसंभारिकी से संबंधित मुद्दों की पहचान करना और फिर उन क्षेत्रों की पहचान करना जिन क्षेत्रों में सरकार को निजी निवेश/एफडीआई करने की आवश्यकता है तथा उन क्षेत्रों के पहचान करना जहां सरकार को निवेश करना है, पर संबंधित राज्य सरकारों द्वारा ठोस प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। अच्छे राजस्व मॉडल वाले आईसीडी/सीएफएस के बारे में निजी क्षेत्र में सोचा जा सकता है जबकि कोल्ड चेन संभारिकीवेयरहाउसरेल और सड़क अवसंरचना आदि के लिए सार्वजनिक धन की आवश्यकता होगी। अवसंरचना अंतर संबंधी एक स्पष्ट कार्य योजना राज्य और केंद्र सरकार को इस तरह की अवसंरचना के लिए संसाधनों की पहचान करने में सक्षम बनाएगी।

सरकार ने कृषि क्षेत्र को निर्बाधगुणवत्ता और सस्ती बिजली की आपूर्ति करने का प्रयास किया है। विभिन्न उपाय अर्थात कृषि मांग पक्ष प्रबंधन योजना (एजीडीएसएम), दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजनासभी के लिए विद्युत और कोल्ड स्टोरेज उद्योगग्रामीण भारत योजना के लिए कुसुम हार्नेसिंग सोलर पावर ने स्थिति को बेहतर बनाने में सहायता की है। देश में अनुकूल विद्युत की स्थिति का उपयोग कृषि निर्यात को सुविधाजनक बनाने के लिए अपेक्षित अवसंरचना में सहायता के लिए किया जा सकता है।

 

5.4.घ. निर्यात में सहयोग करने के लिए राज्य स्तर और समूह स्तर पर संस्थागत तंत्र: कृषि निर्यात नीति विभिन्न राज्यों द्वारा मॉडलों की जांच करेगी और कृषि उत्पादों के निर्यात से संबंधित विभिन्न विभागों के बीच समन्वय करने में कुछ सर्वोत्तम परिपाटियों का सुझाव देगी। कृषिबागवानीमत्स्य पालनखाद्य प्रसंस्करण और वाणिज्य एवं उद्योग आदि जैसे विभाग राज्य स्तर पर इन उत्पादों के कृषिबागवानीजलीय कृषिचायकॉफीमसालों और मूल्यवर्धन से संबंधित उत्पादन और बाद के सार-संभाल संबंधी मुद्दों की देखभाल करते हैं। कुछ राज्यों में निर्यात प्रोत्साहन उपायों की सुविधा के लिए या तो मुख्य सचिव या कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में समितियां वाणिज्य विभाग के तहत विभिन्न विभागों के साथ और डीजीएफटीसीमा शुल्क और स्वायत्त निकायों के साथ समन्वय करने में एक प्रभावी काम करती आ रही हैं।

 

मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय निर्यात निगरानी समिति और वाणिज्य विभाग के तहत - डीजीएफटी के क्षेत्रीय अधिकारियों, स्वायत्त निकायों द्वारा समर्थित - कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा), समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीएनिर्यात निरीक्षण) परिषद (ईआईसी)मसाला बोर्डकॉफी बोर्डटी बोर्डरबर बोर्डतंबाकू बोर्डविभिन्न निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसी)सीमा शुल्कसंयंत्र/पशु संगरोध राज्य स्तर पर इस प्रयोजन के लिए संस्थागत तंत्र प्रदान कर सकते हैं।

 

इसी प्रकारकृषि निर्यात नीति के कार्यान्वयन में हुई प्रगति की मॉनीटरिंग के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर एक संस्थागत तंत्र की परिकल्पना की गई है। वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति और डीएसीएंडएफडब्ल्यू, डीएएचडीएफ, डीएआरई/आईसीएआर, डीओसीए, डीएफपीडीएमओएफपीआई, एफएसएसएआई, डीजीएफटीसीमा शुल्क के सचिवों की भागीदारी और तिमाही आधार पर बैठक करने वाले संबंधित राज्य सरकारों के प्रतिनिधि प्रयासों/योजनाओं के अभिसरण की सुविधा प्रदान करेगी। नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले कार्यों का सुझाव देगी। सभी संबंधित विभागोंसंगठनों और राज्य सरकार द्वारा सुपुर्दगीयोग्य सामानों के संबंध में पालन करने के लिए वाणिज्य विभाग में एक मॉनिटरिंग सेल की स्थापना की जानी है। मॉनिटरिंग सेल द्वारा भूमिकाओं और जिम्मेदारी की उचित पहचान के साथ कदम उठाए जाएंगे।

 

समूह विकास कार्य की निगरानी के लिए नोडल कलेक्टर/निदेशक (कृषि)/(बागवानी)/(मत्स्य पालन) के तहत समूह सुविधा कार्यढांचा भी प्रस्तावित है। समूह स्तर की समिति में निर्यातकसंभावित निर्यातककिसानों की उत्पादक कंपनियांउत्पादकों की सहकारीपंचायत/डे-एनआरएलएम आदि महत्वपूर्ण हितधारक हैं। उपर्युक्त हितधारकों और संबंधित विभागों को शामिल करके नोडल कलेक्टर/निदेशक के स्तर पर त्रैमासिक बैठक समूहों को उत्पादकता बढ़ानेनिर्यात करने योग्य वस्तु की खेती के तहत क्षेत्र में वृद्धि और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार करने में सक्षम बनाएगी। किसानों के उत्पादक संगठनोंकिसानों की सहकारी समितियों को निर्यात मूल्य श्रृंखला से जोड़ना अवसंरचना के निर्माण के माध्यम से शुरू किया जाएगाजिससे समूहों में प्राथमिक और माध्यमिक प्रसंस्करण की सुविधा होगी और उन्हें निर्यातकों से भी जोड़ा जा सकेगा।

 

इसके अलावाकुछ राज्यों में राज्य स्तर पर निम्नलिखित मध्यस्थताएं की जाती हैं।

 

(क) अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए उद्योग निकायों/एसोसिएशनों को प्रोत्साहित करना

विभिन्न खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न निकायों को नए बाजारों तक पहुंचने और मौजूदा बाजारों में समेकन के बारे में सुझाव देने के लिए अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है।

 

(ख) अनुसंधान और विकास में उद्योग की अधिक से अधिक भागीदारी

विभिन्न अनुसंधान संगठनों और उद्योग निकायों के बीच अधिक से अधिक सहभागिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है जो अनुसंधान निकायों को उद्योग की विशिष्ट आवश्यकताओं पर काम करने में सक्षम बनाएगा।

 

6. संचालन संबंधी सिफारिशें

6.1 समूहों पर ध्यान दें

 

वर्ष 2018-19 के लिए बजट पेश करते हुएवित्त मंत्री ने भारत में कृषि और बागवानी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक समूह विकास दृष्टिकोण पर ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया। निर्यात केंद्रित समूहों में एक समान दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप उत्पादन का अधिक जोर पूर्व और कटाई के बाद का प्रबंधन की संभावना है और साथ ही उन समूहों से निर्यात के उच्च स्तर को प्राप्त करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला को अपग्रेड करने में भी मदद मिलने की संभावना है।

 

चुनिंदा उपज (जों) के लिए ब्लॉक स्तर पर गांवों के समूह के भीतर समूह उद्यम (मों) के रूप में पूरी मूल्य श्रृंखला के लिए छोटे और मध्यम किसानों की प्रभावी भागीदारी और उन्हें लगाने के लिए संस्थागत तंत्र को विकसित करने और लागू करने की आवश्यकता है। यह कृषक समुदाय को वास्तविक लाभ लेने और संपूर्ण मूल्य श्रृंखला के माध्यम से उनकी आय को दोगुना करने के लिए सशक्त बनाने में मदद करेगा।

 

बागवानी उत्पादों का निर्यात करने के लिए आयात मांगों से मेल खाते हुए मानक मानदंडों के साथ उसी किस्म के उच्च गुणवत्ता उत्पाद की काफी मात्रा की आवश्यकता होती है। भारत में छोटे लैंडहोल्डिंग पैटर्न और कम किसान जागरूकता का अर्थ प्रायः कई फसलों की विभिन्न किस्मों की सीमित मात्रा में होता हैजिनमें बहुत कम या कोई मानकीकरण नहीं होता है। सभी राज्यों में निर्यातोन्मुख समूह विकास मानक भौतिक और निर्यात मांगों को पूरा करने वाले गुणवत्ता मानदंडों वाले अधिशेष उत्पाद सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख होगा। ऐसी योजना की सफलता राज्य सरकार की अवसंरचना पर निर्भर करेगी। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार निम्नलिखित के लिए राज्य अवसंरचना को मजबूत करके राज्य सरकारों को प्रोत्साहित करे और उन्हें प्रोत्साहन दे:

 

  • उपयुक्त उत्पादन समूहों की पहचान करना
  • किसान पंजीकरण आयोजित करना
  • भू अभिलेखों का डिजिटलीकरण
  • किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का संवर्धन

 

घरेलू कारक निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिसमें प्रौद्योगिकीव्यापार सुविधाअवसंरचनासंभारिकीविनियमनसंस्थानोंप्रतिस्पर्धी बाजारों और फसल-पूर्व सहित आपूर्ति श्रृंखला के सभी चरणों में निजी व्यापार की भागीदारी शामिल है। यह सिफारिश की जाती है कि इस योजना में उन निजी निर्यातकों के साथ सक्रिय भागीदारी शामिल होजिनके पास ऐसे समूहों को बढ़ावा देने के लिए एक स्वभाविक प्रोत्साहन हो। यह उम्मीद की जाती है कि कृषि निर्यात में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी से बेहतर समन्वय और निर्यातोन्मुख उत्पादन पर जोर आएगा।

कृषि उत्पादक संगठन छोटे धारकों को बड़े पैमाने पर नुकसान से उबारने और आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा दूर के बाजारों तक अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद करने के लिए एक संस्थागत नवाचार हैं। नई एईपी एफपीओ द्वारा सामना की जाने वाली नीति बाधाओं को हल करेगी और एफपीओ नेटवर्क के विस्तार के लिए नाबार्डएसएफएसी और राज्य स्तर के संगठनों के माध्यम से काम करेगी।

 

इन समूहों के सफल कार्यान्वयन के अध्यधीनएग्री एक्सपोर्ट ज़ोन (एईजेडमें जाने की बात मूल्यवर्धनसामान्य सुविधा निर्माण और ऐसे क्षेत्रों से अधिक निर्यात की सुविधा के बारे में सोचा जा सकता है। डब्ल्यूटीओ अनुकूल तरीके से एईजेड की स्थापना और कामकाज की दिशा में उपाय किए जाएंगे। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के उद्देश्य से निर्यातकों के लिए तुलनात्मक रूप से कम कीमत पर वस्तुओं के उत्पादन की सुविधा प्रदान करता है। भारत के पास आईटीटेक्सटाइलफार्मास्युटिकल और कुछ बहु-क्षेत्रीय जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में स्थापित कई सफल एसईजेड हैं। कृषि निर्यात एसईजेड के विकास के लिए अवसर है जिनकी उद्देश्य मुख्य रूप से उन कुछ देशों के लिए मूल्यवर्धित कृषि वस्तुओं का उत्पादन करना हैजो मुख्य रूप से कृषि उत्पादों के आयात पर निर्भर हैं। कुछ देशों (अनाजसब्जियों और फलों की घरेलू उपलब्धता में पर्याप्त अंतर वाले) के हित का पता लगाया जा सकता है ताकि उस देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि निर्यात एसईजेड में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लाया जा सके। उन देशों द्वारा पूर्ण बायबैक व्यवस्था की जा सकती है जो एफडीआई में ला रहे हैं और इस प्रकार भारतीय निर्यात के लिए एक स्थिर बाजार प्रदान कर रहे हैं।

 

हितधारकों ने समूहों के विकास के माध्यम से निर्यातोन्मुख उत्पादन के लिए एक कोष के निर्माण की सिफारिश की है। यह मानकीकृतअच्छी गुणवत्ता के निर्यात की मात्रा को बढ़ाने की कुंजी होगी।

 

कृषि निर्यात नीति के भाग के रूप मेंनिर्यात संवर्धन के लिए निम्नलिखित विशिष्ट उत्पाद-जिला समूहों की पहचान की गई है। उत्पाद/समूहों की पहचान निर्यात में योगदान करने वाले विद्यमान उत्पादन, निर्यातक प्रचालन, प्रचालनों की मापनीयता निर्यात बाजार के आकार/भारत के हिस्सेएसपीएस आवश्यकताओं के बारे में जागरूकताऔर अल्पावधि में निर्यात में वृद्धि की संभावना के आधार पर की जाती है। नीचे दिए गए समूहों की सूची अनंतिम है और ये बढ़ सकते हैंबशर्ते कि समूह के गठन की शर्तें पूरी हों।


 

 

उत्पाद

क्षेत्र

राज्य

जिला

 

 

केला

 

 

दक्षिण

केरल

थ्रिसूर, वायनाड, तिरूवनंतपुरम

आंध्र प्रदेश

कडप्पा, अनंतपुर

तमिलनाडु

त्रिची, थेनी, पोलाची

 

पश्चिम

महाराष्ट्र

जलगाँव, कोल्हापुर, सोलापुर

गुजरात

भरूच, नर्मदा, सूरत

 

 

अनार

दक्षिण

आंध्र प्रदेश

अनंतपुर, कुरनूल

कर्नाटक

बेलगाम, मैसूर

पश्चिम

महाराष्ट्र

सोलापुर, अहमदनगर, पुणे

केंद्रीय

मध्य प्रदेश

खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर

 

 

आम

पश्चिम

महाराष्ट्र

रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग

गुजरात

जूनागढ़, वलसाड, कच्छ, नवसारी

उत्तरी

उत्तर प्रदेश

सहारनपुर, मेरठ, लखनऊ

 

दक्षिण

तेलंगाना

रंगारेड्डी, महबूबनगर, वारंगल

आंध्र प्रदेश

कृष्णा, चित्तूर, कुरनूल

अंगूर

पश्चिम

महाराष्ट्र

पुणे, नासिक, सांगली

गुलाबी प्याज

दक्षिण

कर्नाटक

बैंगलोर ग्रामीण, चिक्काबल्लपुरा

 

प्याज

पश्चिम

महाराष्ट्र

नासिक

केंद्रीय

मध्य प्रदेश

इंदौर, सागर, दमोह

 

 

आलू

 

उत्तरी

उत्तर प्रदेश

आगरा, फर्रुखाबाद

पंजाब

जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला, नवाशहर

पश्चिम

गुजरात

बनासकांठा, सबरकांठा

केंद्रीय

मध्य प्रदेश

इंदौर, ग्वालियर

चाय

पूर्व

असम

तिनसुकिया, सिबसागर, डिब्रूगढ़

कॉफी

दक्षिण

कर्नाटक

चिक्कमगलुरु, कोडगु, हसन

समुद्री उत्पाद

दक्षिण

आंध्र प्रदेश

पूर्वी गोदावरी, विशाखापट्टनम, पश्चिमी गोदावरी, नेल्लोर

पूर्व

ओडिशा

जगतसिंहपुर, भद्रक, बालासोर

पश्चिम

गुजरात

कच्छ, वेरावल, नवसारी, वलसाड

मिर्च

दक्षिण

तेलंगाना

खम्मम, वारंगल

आंध्र प्रदेश

गुंटूर

 

हल्दी

दक्षिण

तेलंगाना

निजामाबाद, करीमनगर

केरल

वायनाड, एलेप्पी

पूर्व पूर्व

मेघालय

पश्चिम जैंतिया हिल्स

ओडिशा

कंधमाल

जीरा

पश्चिम

गुजरात

बनासकांठा, मेहसाणा

उत्तरी

राजस्थान 

जालोर, जोधपुर, बाड़मेर, नागौर, पाली

काली मिर्च

दक्षिण दक्षिण

केरल

वायनाड

कर्नाटक

चिकमंगलूर

इलायची

दक्षिण

केरल

इडुक्की

ईसबगोल

उत्तरी

राजस्थान 

जोधपुर, नागौर, बाड़मेर, जैसलमेर

अरंडी

पश्चिम

गुजरात

बनासकांठा, कच्छ, पाटन, साबरकांठा, मेहसाणा

संतरा

पश्चिम

महाराष्ट्र

नागपुर, अमरावती, वर्धा

 

एपीडाएमपीईडीएईआईसी और अन्य वस्तु बोर्ड किसान पंजीकरणएफपीओ फॉर्मेशनगुणवत्ता आदानों का प्रावधानमूल्य खोजतकनीकी संगठन के माध्यम से किसान प्रशिक्षण और तीसरे पक्ष के प्रमाणीकरण से शुरू होने वाली आपूर्ति श्रृंखला के स्वामित्व के लिए कार्यढांचा प्रदान करेंगे। इसके कार्यान्वयन में राज्य कृषि/बागवानी/मत्स्य पालन विभागराज्य कृषि विश्वविद्यालयोंआईसीएआर संस्थानों और खाद्य प्रसंस्करण विभाग की पूर्ण भागीदारी की आवश्यकता होगी। इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत एकीकृत कृषि विकास (पीपीपी-आईएडी) योजना के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ जोड़ा जा सकता है क्योंकि बाजार की सफलता के लिए निजी उद्योग की भागीदारी महत्वपूर्ण है।

 

अभिज्ञात समूह क्षेत्रों में निर्यातोन्मुख अवसंरचना के विकास पर जोर देने का प्रयास होगा जहाँ एकीकृत फसल-कटाईप्रसंस्करण सुविधाएँप्रयोगशालाएँ इत्यादि की स्थापना एमओएफपीआई (पीएमकेसंपदा)/डीओसी (टीआईईएस)/डीएसी और परिवार कल्याण (एमआईडीएच)/डीएएचडीएफ (आईडीएमएफ) आदि के सहयोग से की जाएगी ताकि मानकीकृत नयाचारपैकेजिंगस्वच्छता एवं पादपस्वच्छता मुद्दों के अनुपालन में निर्यातोन्मुख कृषि उत्पादन और प्रसंस्करण लिया जा सका तथा इसे विपणन चैनल के अगले स्तर तक जोड़ा जा सके और नेटवर्किंग की जा सके।

 

अभिज्ञात समूहों मेंस्मार्ट कृषि के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ अभ्यास साझा करनेकीट प्रबंधन के लिए मोबाइल ऐप का उपयोग करनेकृत्रिम आसूचना का उपयोग करनेनिगरानी के लिए ड्रोन का उपयोग करने और लेज़र लैंड लेवलरप्रोपेल्ड स्प्रेयरप्रिसिजन सीडर और प्लांटर्सरोपाई के लिए ट्रांसप्लांटर्समल्टी थ्रेशर आदि जैसे क्षेत्रों में नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए भी प्रयास किया जाएगा। बीजोंकीटनाशकोंउर्वरकों और पानी के समुचित उपयोग पर नया जोर देने की आवश्यकता हैजो सिंचाई के लिए क्षेत्र को दोगुना कर सकते हैं।

 

6.2 मूल्यवर्धित निर्यातों का संवर्धन

6.2.कस्वदेशी वस्तुओं और मूल्यवर्धन के लिए उत्पाद विकास: यह प्रस्तावित है कि कृषि निर्यात नीति में मूल्यवर्धितस्वदेशी और जनजातीय उत्पादों के संवर्धन पर जोर दिया जाना चाहिए। जैसा कि पिछले खंडों में उल्लेख किया गया हैभारत के निर्यात हिस्से में बहुत कम या बिना प्रसंस्करण या मूल्य संवर्धन वाले उत्पादों का प्रभुत्व है।

 

हितधारकों ने स्वदेशी श्रेणी में अभिज्ञात वस्तुओं के लिए वित्तीय सहायता की सिफारिश की है जिसमें गैर-वन उपजजंगली जड़ी-बूटियांऔषधीय पौधेअर्कलाखआवश्यक तेल आदि शामिल हैं। इसके लिए सशक्त ब्रांडिंग प्रयासों के साथ निर्यात योग्य उत्पादों को विकसित करने के लिए गहन निर्यात केंद्रित अनुसंधान की आवश्यकता होगी।

 

हितधारकों ने मूल्यवर्धित उत्पादों के संबंध में विकास और अनुसंधान के लिए एक वित्तीय पैकेज का सुझाव दिया है। उदाहरण के लिए काजू को मूल्यवर्धित रूप में निर्यात करने की आवश्यकता है जैसे काजू सेब के जैम और पेस्टस्वाद वाले काजूआदि। वर्तमान में काजू निर्यात का 4% से भी कम मूल्यवर्धित रूप (सीएनएसएलरोस्टेड/नमकीन नट्स) में है। उद्योग का अनुमान उन देशों को निर्यात की एक महत्वपूर्ण मात्रा का सुझाव देता है जो सीमित मूल्यवर्धन करते हैं और इसे फिर से निर्यात करते हैं।

 

कुछ प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों पर प्रारंभिक कार्य से निम्नलिखित बातें सामने आई हैं:

 

उत्पाद

निर्यातों का वर्तमान स्तर 

अगले 3 वर्षों में प्रस्तावित निर्यात

संभावित बाजार

बिस्किट एवं कन्फैक्शनरी 

185 मिलियन डॉलर

350 मिलियन डॉलर

अंगोला, संयुक्त राज्य अमेरिका, हैती, नामीबिया, यूगांडा, संयुक्त अरब अमीरात, नाइजीरिया, केन्या 

भारतीय एथनिक भोजन

114 मिलियन डॉलर

200 मिलियन डॉलर

संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडासंयुक्त अरब अमीरात, नेपाल

अनाज से तैयार

471 मिलियन डॉलर

800 मिलियन डॉलर

संयुक्त राज्य अमेरिकाबांग्लादेश, यूनाइटेड किंगडम, नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात, अंगोला 

सूखी प्याज, अन्य सब्जियां और खीरा सहित जमी हुई सब्जियां

207 मिलियन डॉलर

400 मिलियन डॉलर

संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, बेल्जियम, रूस, फ्रांस

प्रसंस्कृत फल – जूस, सार

338 मिलियन डॉलर

600 मिलियन डॉलर

सऊदी अरब, नीदरलैंड, यमन, यूके, संयुक्त राज्य अमेरिका, अल्जीरिया, केन्या

 

6.2.खमूल्यवर्धित जैविक निर्यातों का संवर्धन: वर्तमान मेंभारत से जैविक निर्यात 3450 करोड़ रुपये (2017-18) की रेंज में हैं। जैविक उत्पादों का वैश्विक व्यापार 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर की रेंज में होने का अनुमान है। अतःभारत से जैविक निर्यातविशेषकरमूल्यवर्धित जैविक निर्यातों की गुंजाइश बहुत अधिक है। जैविक उत्पादन संबंधी राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीओपी) के तत्वावधान में, निर्यात के लिए अच्छी संभावना वाले पशुधनएक्वा-संस्कृति जैसे उत्पादों की नई श्रेणियों को शामिल किया गया है। इससे मूल्यवर्धित जैविक निर्यात को बढ़ावा मिलने की संभावना है। इसके अलावाभारत से निर्यात किए जाने वाले मूल्यवर्धित वस्त्रों को संवर्धित करने के लिए जैविक वस्त्र संबंधी मानकों को भी शामिल किया जा सकता है।

 

वर्तमान मेंभारत से जैविक प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात का प्रतिशत कुल जैविक खाद्य निर्यात का केवल 5.5% है। केवल सीमित उत्पादों (आम का पल्पप्यूरीतेल फसलों के सह-उत्पादसोया भोजनकेक और कुछ खाने के लिए तैयार उत्पाद) और चीनीचायखाद्य तेलकॉफी और आवश्यक तेलों जैसे एकल प्रसंस्कृत उत्पादों का निर्यात किया जाता है। भारत मूल्यवर्धित फलों और सब्जियोंआईक्यूएफ फलों और सब्जियोंखाने के लिए तैयार उत्पादोंअचारसूप और सॉसडेयरी उत्पादप्रसंस्कृत पशुधनएक्वाकल्चर उत्पादकपड़ा उत्पादआदि की पूरी रेंज के निर्यात पर विचार कर सकता है। मूल्यवर्धित जैविक निर्यातों के संवर्धन के लिए हितधारकों द्वारा कुछ विचार निम्नलिखित रूप में साझा किए जाते हैं:

 

  1. जैविक उत्पादों की मार्केटिंग और ब्रांडिंग

 

जैविक निर्यातकों ने सुझाव दिया है कि खुदरा बाजार में जैविक उत्पाद स्थापित करने की अवधि लंबी है और उसे शुरू करने की लागत बहुत अधिक है। उत्पाद पंजीकरण के लिए सहायताजैविक खुदरा श्रृंखलाओं में शेल्फ स्थान खरीदने के लिए सहायता आदि के लिए निर्यातकों द्वारा मांग की गई है।

 

एनपीओपी के कार्यान्वयन के लिए नोडल संगठन के रूप में एपीडा भारत से जैविक निर्यात बढ़ाने के लिए आवश्यक समन्वय करेगा।

 

  1. जैविक और जातीय उत्पादों के लिए समान गुणवत्ता और पैकेजिंग मानकों का विकास करना

 

विकसित देशों से मूल्यवर्धितरेडी-टू-ईट और जातीय भोजन की मांग बढ़ रही हैविशेष रूप से दुनिया भर में प्रवासी भारतीय आबादी से उत्पन्न हो रही है। वैश्वीकरण और जीवन शैली की बीमारियों के प्रसार के युग मेंदुनिया भर में गुणवत्ता के प्रति जागरूक उपभोक्ता अपने भोजन में आरामराहत और स्वास्थ्य लाभ चाहते हैं। भारत एक स्टॉप सॉल्यूशन की पेशकश कर सकता है और स्वस्थ एवं जैविक से लेकर प्रसंस्कृत और सुविधाजनक भोजन तक कई जातीय उत्पाद प्रदान कर सकता है। यह उद्यमियों के लिए हमारी पारंपरिक खाद्य विरासत का लाभ उठाने और स्वादपैकेजिंगसंलयन भोजन और भोजन के शेल्फ जीवन में नवाचार में निवेश करने के लिए एक उत्कृष्ट अवसर है।

 

भारत की 5000 साल पुरानी पारंपरिक आयुर्वेदिक खाद्य प्रणाली एक संभावित गेम चेंजर की भूमिका निभा सकती है। पारंपरिक भारतीय ज्ञान से उपजी हल्दी में घाव भरने के विश्व प्रसिद्ध गुणधर्म हैं। योग के निर्यात की तरहयही वह पारंपरिक ज्ञान है जिसे दुनिया तक पहुँचाया जाना चाहिए और इन उत्पादों का विपणन अनिवार्य रूप से होगा। भारतीय आयुर्वेद उत्पादों, मसालों का उपयोगकभी-कभी बढ़ते न्यूट्रास्युटिकल बाजार के लिए एक आशाजनक संभावना है।

 

  • अचार बनाना संरक्षण की कला है जो आधुनिक आरएंडडी खाद्य उत्पादों के शेल्फ जीवन को बढ़ाने के प्रयासों से बहुत पहले ही महारत हासिल कर चुका है।
  • दालचावल (पोहा)बिरयानीचिकन टिक्का मसालाकबाबसमोसा और पराठे की कई किस्मों वाले रेडी टू कुक/रेडी टू ईट पूरे विश्व में लोकप्रिय हैं।
  • नमकीन/स्नैक्स जैसे मुरुक्कू और दाल मोट प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं जो पश्चिम में वसा से भरपूर स्नैक्स की जगह ले सकते हैं।
  • मार्कफेड अमेरिकासंयुक्त अरब अमीरात और कनाडा जैसे देशों में सरसों दा साग जैसे ब्रांडेडडिब्बाबंद भारतीय व्यंजनों के भारी मात्रा में निर्यात करने में सफल रहा है। इसी प्रकारविभिन्न क्षेत्रों में लोकप्रिय व्यंजनों का विदेशों में भारी मात्रा में विपणन किया जा सकता है।

तथापिबड़े पैमाने पर असंगठितजातीय खाद्य उद्योग में कुछ हद तक भौतिक और गुणवत्ता मानकों के मानकीकरण की अनदेखी की गई है। ब्रांडिंग के अभियानों के अलावाजातीय व्यंजनों को बढ़ावा देने के लिए पैकेजिंग और गुणवत्ता नयाचार के मानकीकरण एवं विकास की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिएपनीर और रसगुल्ला निर्यातकम शेल्फ जीवनकठिन नमूना और अत्यधिक लीड टाइम से ग्रस्त हैंजो प्रासंगिक नयाचार विकसित करके तत्काल कम किया जाना चाहिए।

 

  1. उत्तर पूर्व में जैविक उत्पाद

 

यद्यपि उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में गुणवत्ता वाले जैविक उत्पाद उपलब्ध हैंलेकिन इन उत्पादों का निर्यात नहीं हो रहा है। निर्यात शुरू करने के लिए, अमूल का विकास - विशेष रूप से पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में शैली सहकारी समितियों की आवश्यकता है। यह क्षेत्र से उत्पादों के लिए खरीद और तेलयुक्त वितरण नेटवर्क में अनुशासन लाएगा। इस तरह के सहकारी उत्पादों की ग्रेडिंग/ छंटाई/परीक्षण कर आगे बेचा या प्रसंस्कृत किया जा सकता है।

 

6.2 गआगामी बाजारों के लिए नए उत्पाद विकास हेतु अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों का संवर्धन: आहार में प्रमुख विटामिन/खनिजों की कमी के कारण बच्चों और बीमारियों में कुपोषण के मद्देनजर खाद्य उत्पादों का सुदृढ़ीकरण महत्वपूर्ण है। साथ हीस्वास्थ्य लाभ (लस मुक्तसुपर अनाजस्टार्च मुक्त आदि) के लिए मजबूत खाद्य पदार्थों के विकास में रुचि बढ़ी है। पश्चिमी देशों में बहुत सारे मोटे अनाज सहित नए सुपर भोजन की मांग बढ़ रही है। भारत के जनजातीय भागों और बारिश के दुर्लभ क्षेत्रों में मोटे अनाज के छोटे लेकिन मजबूत उत्पादन को देखते हुएभारत से निर्यात बढ़ाने की महत्वपूर्ण क्षमता है। एफएसएसएआई से आग्रह किया जाएगा कि घरेलू बाजार के लिए मजूबत उत्पादों के संबंध में मानक अधिसूचित किए जाएंजिसके परिणामस्वरूप निर्यात अधिक होगा। 

 

6.2 घ. कौशल विकास: जैसा कि पहले उल्लेख किया गया हैभारत वैश्विक मूल्य श्रृंखला के बाजारों में वस्तुओं की आपूर्ति करता रहा है जो आगे मूल्य वृद्धि करते हैं और उत्पाद पर अधिक आय वसूलते हैं। भारत वियतनाम के लिए जमे हुए झींगा का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। वियतनाम में उपलब्ध कुशल जनशक्ति सेमहत्वपूर्ण मूल्यवर्धन किया जाता है और गंतव्य बाजारों को फिर से निर्यात किया जाता है। भारत में उन्नत प्रसंस्करण संयंत्र होने के कारणबेहतर गुणवत्ता प्रणाली मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्यात में बहुत प्रगति करने में असमर्थ है। कौशल विकास सुविधाओं/पाठ्यक्रम की कमी को प्रणाली में एक कमी कही जाती है। 

बदलते ग्राहक वरीयताओं के साथ गति बनाए रखने के लिए नियमित आधार पर कौशल विकास के अवसरों के साथ कार्य बल प्रदान करने की आवश्यकता है। कार्य बल के अलावाविभिन्न खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं के क्षमता विकासविशेष रूप से एमएसएमई और असंगठित क्षेत्रों से उन्हें विदेशी बाजारों और वैश्विक कृषि-व्यवसाय मूल्य श्रृंखला को लेने में सक्षम बनाने की आवश्यकता है। एक अलग मंत्रालय की स्थापना से भारत सरकार के कौशल विकास पर जोर देने सेकौशल विकास केंद्रीय मंच लेता है।

 

6.3 "ब्रांड इंडिया" का विपणन एवं संवर्धन

 

हितधारकों ने जैविकमूल्यवर्धितजातीयजीआईक्षेत्र विशिष्ट और ब्रांडेड उत्पादों के विपणन के लिए समर्पित अलग-अलग निधियां बनाने का सुझाव दिया है। यह भी सलाह दी गई है कि विपणन अभियान व्यक्तिगत फलों या उत्पादों जैसे "वंडरफुल पोम" और "भारत के केले" के लिए बनाए जाएं। इस निधि का उपयोग मुख्य रूप से सभी प्रमुख लक्षित बाजारों में एक ब्रांडिंग ब्लिट्ज के रूप में निरंतर संचार अभियान के लिए किया जाएगा। इसे डिजिटल और पारंपरिक मीडिया प्लेटफार्मों दोनों का उपयोग करना चाहिए।

 

सरकार को लक्षित जीआई पंजीकरणहितधारक बातचीत और जीआई टैग के संरक्षण के लिए अपने ठोस प्रयासों को जारी रखना चाहिए। "मेक ऑफ इंडिया" के रूप में हमारे सबसे अच्छे उत्पादों का विपणनविज्ञापन की ओर कदम बढ़ाने और हमारे विशिष्ट उत्पादों के जीआई में निवेश करने से हमारे निर्यात में तेजी से वृद्धि होगी। निर्यातकों को लक्षित बाजारों में उत्पाद पंजीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना है।

 

क्षेत्र विशिष्ट कृषि/प्रसंस्कृत उत्पाद भारतीयों के प्रसार क्षेत्र में लोकप्रिय हैं और अगर इसका संवर्धन किया जाता है तो यह आयातक देश के नागरिकों के क्षेत्र में भी स्थान ले सकता है। उदाहरण के लिए बिहार से मखानाआगरा पेठाहैदराबादी बिरयानी लोकप्रिय हैं और उनकी अलग पहचान है। भारतीय जातीय भोजन जैसे 2-3 दिनों के शेल्फ जीवन के साथ मूल्यवर्धित उत्पादों का उत्पादन किया जा सकता है और जीसीसी एवं आसियान सुपरमार्केट को रोजाना हवाई मार्ग से भेजा जा सकता है।

 

वाणिज्य विभाग एक अनुमान तैयार करने के लिए हितधारकों के साथ काम करेगा और इस तरह के विपणन अभियान के कार्यान्वयन के लिए संबंधित मंत्रालयों के साथ काम करेगा।

 

समान समूह देशों और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देशों के साथ कृषि निर्यात संवर्धन गतिविधियों की बेंचमार्किंग का निर्धारण करना उपयुक्त होगा। हितधारक द्वारा प्रायः उल्लिखित उदाहरणों में से एक उदाहरण मलेशिया में किया गया प्रयोग है। मलेशिया ने "मलेशिया का सर्वश्रेष्ठ" नामक एक वस्तु ब्रांडिंग कार्यक्रम पेश किया है। यह देश के बागवानी उत्पादों के लिए एक अम्ब्रेला ब्रांड है जो मलेशियाई मानकों और मलेशियाई गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिस सिस्टम के अनुसार गुणवत्ता और सुरक्षा की गारंटी देता है। यह कारंबोलापपीताअनानासआम और तरबूज के लिए शुरू किया गया थालेकिन अन्य सभी वस्तुओं के लिए बढ़ाया जाना है। मलेशिया में सभी किसान प्रमाणित होने के लिए आवेदन कर सकते हैंयद्यपिशुरू मेंअधिकांश प्रमाणित किसानों को सुपरमार्केट में डिलीवरी के लिए संघीय कृषि विपणन प्राधिकरण (एफएएमएसे अनुबंधित किया जाता है। भारतीय केलेआमअनानासअनारलीचीभारतीय चाय और कॉफी, भारतीय मसालों के लिए इसी तरह के अभियान निर्यातकोंस्वायत्त निकायों और आईबीईएफ के संयुक्त प्रयासों से शुरू किया जा सकता है।

 

भारत देश के विभिन्न भागों में कई किस्म के कृषि उत्पादों का उत्पादन करता है। उत्पादन की अपनी खंडित बिक्री के कारणबड़े आदेशों को पूरा करने के लिए कृषि उत्पादन को एकत्र करना बड़े आकार की निर्यात कंपनियों के साथ भी एक कठिनाई बन जाती है। विभिन्न राज्यों में विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध मौजूदा स्टॉक का पता लगाने के लिए कोई सूचना तंत्र नहीं है। वर्तमान में भारतीय एजेंसियां निर्यात विकास की दिशा में विशिष्ट कार्य कर रही हैं। तथापि, ऑर्डर क्लोजर के साथ विशिष्ट फील्ड स्तर का विपणन किसी भी एजेंसी द्वारा नहीं किया जा रहा है।

 

एसएचजी/एफपीओ/सहकारी समितियों/कारीगर समूहों के लिए एक मंच प्रदान करने हेतुकृषि निर्यात नीति एक सार्वजनिक निजी भागीदारी तंत्र के माध्यम से सभी विश्वसनीय एसएचजी, एफपीओसहकारी समितियोंगुणवत्ता प्रमाणित निजी प्रसंस्करणकर्ताओं और व्यापारियों आदि को जोड़ने के लिए एक तंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव करती है जिसमें एक पोर्टल के विकास की संभावना का पता लगाना शामिल है। निर्यात लिंकेज के लिए किसानों की सहकारी समितियोंनिर्माता समितियों आदि के सीधे संपर्क के लिए ई-कॉमर्स मंच प्रदान करना शामिल हो सकता है।

 

6.4 निर्यातोन्मुख गतिविधियों और अवसंरचना में निजी निवेश आकर्षित करना

 

फसल के बाद अवसंरचना कृषि उपज के सुचारू, संभारिकीय आवागमन को सहायता देती है। इसमें निर्यात मात्रा बढ़ानेगुणवत्ता सुनिश्चित करने और प्रति यूनिट बेहतर कीमत वसूली सुनिश्चित करने में एक सीधा सह-संबंध होगा। कुछ लाभ इस प्रकार हैं:

 

  • बेहतर गुणवत्ता अनुपालन: कृषि-उपज के फसल के बाद प्रसंस्करणजैसे फलों पर मोम लगाना, मांस का शोधनखराब/क्षतिग्रस्त फलों/उपज की छंटाईउपज का शेल्फ जीवनकाल बढ़ाएगा और दूर के बाजारों के लिए उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने में मददगार होगा।

 

  • संभारिकी सार-संभाल को आसान बनाने की सुविधा देता है: उपज की बेहतर सार-संभाल सुनिश्चित करेगाअपशिष्ट कम होगाविपणन योग्य अधिशेष मात्रा बढ़ेगी। इससे बेहतर कीमत वसूली (मूल्य और मात्रा दोनों लाभ) होगी, मात्रा सार-संभाल क्षमताएं बढ़ेंगी जिससे सोर्सिंग/कैचमेंट क्षेत्र का विस्तार करने के अवसर मिलेंगे। आयात करने वाले उन देशों में भंडारण सुविधाएं जहां भारत कृषि उत्पादों का एक प्रमुख निर्यातक हैउस देश में वर्तमान निर्यात को बढ़ाने में मदद करेंगी।

 

  • दूर के बाजारों में विस्तार: संभारिकीबेहतर गुणवत्ता और मात्रा से निपटने की क्षमताएं दूर के बाजारों में विस्तार करनेशेल्फ जीवन को बेहतर बनाने/उत्पादन की गुणवत्ता बनाए रखने और दूर के निर्यात स्थलों को कवर करने के लिए उच्च अवसर प्रदान करने के अवसर प्रदान करेगी।

 

ध्यान देने वाले राज्यों से कृषि निर्यात की सहायता करने के लिए प्रस्तावित अवसंरचना में निम्नलिखित शामिल हैं:

 

पैक हाउस:

  • उपज की ग्रेडिंग और प्राथमिक प्रसंस्करण के माध्यम से गुणवत्ता सुनिश्चित कर विपणन अधिशेष बढ़ाने में मदद करेगा।
  • कटाई के बाद के छोटे स्थानों में निर्यात के लिए बड़ी मात्रा में उत्पादन को पूरा करने की क्षमता प्रदान करेगा।

 

प्रसंस्करण संरचना:

  • कच्ची उपज के मूल्य संवर्धन से निरंतर गुणवत्तालंबे शेल्फ जीवन और बेहतर मूल्य वसूली सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
  • नए बाजारों में विस्तार करने और मौजूदा बाजारों में नए उपभोक्ता क्षेत्रों को लेने की क्षमता भी प्रदान करेगाजिससे निर्यात बिक्री बढ़ेगी।

 

शीत भंडारण:

  • कम तापमान माइक्रोबियल और एंजाइमिक क्रियाकलाप को कम करता हैयह लगातार कम तापमान वातावरण प्रदान करके उत्पादन के शेल्फ जीवनकाल को बढ़ाएगा और निर्यात के लिए विपणन योग्य अधिशेष को बढ़ाएगा।
  • ऑफ-सीजन/कम्प्लेंटरी-सीजन मार्केटों को लेने की क्षमता भी प्रदान करेगा।

 

निकास बिन्दु अवसंरचना:

  • अधिकतम संभावित दूरी पर निर्बाध परिवेश तापमान श्रृंखला (कूल चेन/कोल्ड चेन) के रख-रखाव की सुविधा देता है।
  • पेरिशेबल कार्गो सेंटर का प्रावधानकंटेनर स्टफिंग के लिए कार्गो फ्रेट स्टेशनरीफर कंटेनररीफर प्लगस्कैनरबंदरगाह क्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों में कंटेनर रखने की सुविधा आदिइसे निकास बिंदु से उपभोक्ता गेट तक सुनिश्चित करते हैं।

 

एयर कार्गो:

  • अत्यधिक मूल्यवान कृषि उत्पादफ्रेश और पेरिशबल्स एयर कार्गो द्वारा भेजे जाते हैं। सेंटर फॉर पेरिशेबल कार्गोलोडर्सवैक्यूम कूलिंग फैसिलिटीवर्क फ्लोरमूविंग ट्रक डॉक्सनामित और पर्याप्त पेरिशबल्स/एनीमल हैंडलिंग/संगरोध क्षेत्रोंपैलेट कंटेनर हैंडलिंग सिस्टमइंटरनेशनल और डोमेस्टिक एयरपोर्ट्स पर ऑटोमैटिक स्टोरेज रिट्रीवल सिस्टम जैसी अवसंरचना दक्षता/एयर कार्गो के माध्यम से निर्यात की लागत प्रभावशीलता को बढ़ाएगा।
  • कार्गो उद्देश्यों के लिए नए ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों को विकसित करने की संभावना मुंबईदिल्ली आदि के हवाई अड्डों से यातायात को उतार सकती है।

 

विदेश में अवसंरचना:

  • उन आयातक देशों में विभिन्न कृषि उत्पादों के लिए अनिवार्य अवसंरचना सुविधाएं जहां भारत कृषि उत्पादों का एक प्रमुख निर्यातक हैप्रतिस्पर्धियों में बढ़त प्रदान करेगा। यह निर्यातकों को लगातार आपूर्ति प्रदान करनेमालसूची बनाए रखने और वितरण लागत कम करने में मदद करेगा।

वाणिज्य मंत्रालय के तहत स्वायत्तशासी निकाय और निर्यात संवर्धन परिषदें कृषि निर्यात की सुविधा के लिए अवसंरचना से संबंधित कुछ गायब अंतरालों की पहचान और उन्हें मिलाने के लिए एकसमान मंत्रालयोंराज्य सरकारों और निर्यातकों के साथ काम करेंगी। विदेशों में भारतीय मिशनों को विभिन्न देशों में निर्यात की संभावनाओं के बारे में जानकारी प्रदान करने और निर्यात को सुविधाजनक बनाने के लिए सुसज्जित और सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए।

 

6.4 कईज ऑफ डूइंग बिजनेस (ईओडीबी) और डिजिटलीकरण:

  • कृषि स्तर - किसान भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण

भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरणभूमि का भू-मानचित्रण, कृषकों और खेत उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का पंजीकरण सुचारू कृषि निर्यात नीति के कार्यान्वयन के लिए महत्वपूर्ण होता है। केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि इन विवरणों को किसान आधार कार्ड से जोड़ते हुए किरायेदारी को औपचारिक रूप देनेभूमि रिकॉर्ड दर्ज करने और भूमि का उपग्रह मानचित्रण करने के लिए व्यापक अभियान चलाये जा सकें। यह ट्रेसबिलिटीमार्केट लिंकेज स्थापित करने और सार्वजनिक निधियों में लीकेज लीक करने में महत्वपूर्ण होगा। इस तरह के डिजिटलीकरण के सफल कार्यान्वयन से निर्यातोन्मुख खेती के लिए भूमि धारण का समेकन और एकत्रीकरण आसान होगा।

 

  • वाणिज्य विभाग में बाजार आसूचना सेल और सूचना प्रसारण के लिए पोर्टल 

व्यापार और बाजार से संबंधित जानकारी लेने के लिए एक समर्पित मंच हेतु सभी क्षेत्रों में निर्यातकों की लगातार मांग रही है। हाल ही मेंवाणिज्यि विभाग ने ट्रेड एनालिटिक्स के संबंध में एक पोर्टल बनाया है जो विभिन्न बाजारों में विभिन्न वस्तुओं के लिए रुझान प्रदान करता है। इसी प्रकारएपीडा और एमपीईडीए अपने हितधारकों को बाजार आसूचना प्रदान करने के लिए क्रमशः 'एग्री एक्सचेंज पोर्टलऔर 'फिश एक्सचेंज पोर्टलचलाते हैं। इंडिया ट्रेड पोर्टलएफआईईओ द्वारा वाणिज्य विभाग के सहयोग से संचालित किया जाता है और यह एफटीए एवं गैर-एफटीए स्थितियोंएसपीएस सूचनाओं में प्रशुल्क परिदृश्यों से संबंधित जानकारी प्रदान करता है और साथ ही भारतीय दूतावासों को बाजार की पेशकश करने के लिए एक विंडो भी प्रदान करता है। इस प्रकारबाजार आसूचना संबंधी संगत सूचना विभिन्न वेब पृष्ठों में फैल जाती है। प्रशुल्क, गैर-प्रशुल्क, दस्तावेजीकरणकीटनाशक और रासायनिक एमआरएल सूचनाओं से संबंधित वास्तविक समय अद्यतन करने के लिए एक एकीकृत ऑनलाइन पोर्टल विकसित करने हेतु प्रयास शुरू किए जाएंगे। यह पोर्टल निर्यातकों को बाजारमूल्य निर्धारणहेजिंग और एसपीएस सूचनाओं से संबंधित सुविज्ञ निर्णय लेने की सुविधा प्रदान करेगा। पोर्टल में एक शिकायत निवारण तंत्र भी शामिल हो सकता है जो निर्यातकों को बाजार से संबंधित मुद्दों को उठाने और चुनौतियों का सामना करने की अनुमति देता है।

सभी प्रमुख आयातक देशों के लिए भारत से सभी प्रमुख कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए आयातक देशों की अपेक्षाओं का (एमआईसीओआरविकसित करने की आवश्यकता है। निर्यातक देश की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होंगे और निर्यात की गई खेपों की अस्वीकृति के जोखिम को कम कर सकते हैं। एपीडाईआईसीएमपीईडीएवस्तु बोर्ड और परिषदें एमआईसीओआर विकसित करेंगे, उस होस्ट करेंगे और उसे अद्यतन करेंगी। निर्यातकों के साथ नियमित कार्यशालाओं की भी परिकल्पना की गई है।

 

  • व्यापार प्रक्रिया और सुविधा

निर्यातक बताते हैं कि बंदरगाहों पर लंबे और बोझिल दस्तावेज तथा प्रचालन प्रक्रिया एक सतत् चुनौती है (नीचे तालिका देखें)। उन्होंने प्रायः पूरे देश में प्रमुख बंदरगाहों पर खराब होने वाले आयातों और निर्यातों की 24x7 एकल खिड़की स्वीकृति को कार्यान्वित करने की सिफारिश की है। कार्यनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर अधिक संगरोध अधिकारियों को तैनात करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

 

अर्थव्यवस्था

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंक

सीमा पार व्यापार 

रैंक

सीमा अनुपालन

दस्तावेजी अनुपालन

सीमा अनुपालन

दस्तावेजी अनुपालन

निर्यात का समय(घंटे)

निर्यात की लागत: (अमेरिकी डॉलर)

निर्यात का समय(घंटे)

निर्यात की लागत: (अमेरिकी डॉलर)

आयात का समय(घंटे)

आयात की लागत: (अमेरिकी डॉलर)

आयात का समय(घंटे)

आयात की लागत: (अमेरिकी डॉलर)

बांग्लादेश

174

172

100

408

147

225

183

1294

144

370

चीन

84

96

26

522

21

85

92

777

66

171

डेनमार्क

3

1

0

0

1

0

0

0

1

0

भारत

130

133

109

413

41

102

287

574

63

145

मलेशिया

18

49

20

321

10

45

24

321

10

60

सिंगापुर

1

41

12

335

4

37

35

220

1

37

श्रीलंका

107

90

43

366

76

58

72

300

58

283

वियतनाम

90

99

57

309

83

139

64

268

106

183

 

  • शिकायत सेल

भारत से कृषि उत्पादों के आयातक अपनी शिकायतों के बारे में सूचित करने के लिए विदेशों में भारतीय मिशनों के साथ बातचीत करते हैं। निर्यात शिकायतों से संबंधित मुद्दों का अनुवर्ती कार्रवाई और समाधान प्रदान करने के लिए डीजीएफटी कार्यालय में व्यापार विवाद सेल कार्यात्मक रहा है। डीजीएफटी में व्यापार विवाद सेल को निर्यातकों और आयातकों के लिए एक उत्तरदायी शिकायत सेल के रूप में कार्य करने के लिए पुनर्निर्मित किया जाएगा।

 

6.4 खसागर नयाचार का विकास करना: लंबी दूरी के बाजारों के लिए खराब होने वाली वस्तुओं हेतु सागर नयाचार विकसित करना प्राथमिकता पर लिया जाना चाहिए। खराब होने वाली वस्तुओं के निर्यात में वांछित तापमान पर विशेष भंडारणपरिवहन और सार-संभाल की आवश्यकता होती है। समय एक प्रमुख बाधा है और हवाई भाड़ा निर्यातकों के लिए महंगा साबित होता हैजबकि कम मात्रा और खराब अवसंरचना एयरलाइनों के लिए उत्पाद के परिवहन हेतु गैर-अर्थक्षम होती है। तथापिभारत की ताजा उपज का निर्यात तेजी से बढ़ सकता हैयदि सागर नयाचार को छांटी गई वस्तुओं के निर्यात/निर्यात योग्य किस्मों में स्थापित किया जाए। एक सागर नयाचार यह दर्शाएगा कि क्या सागर द्वारा परिवहन के लिए परिपक्वता स्तर की कटाई की जा सकती है। यह कार्य शिपिंग लाइनोंरेफर सेवा प्रदाताओंआईसीएआर और एपीडा के साथ साझेदारी में किया जाना होता है। फिलीपींस और इक्वाडोर इसमें एक खास मामला है - दोनों देश क्रमशः 40 और 24 दिनों की समुद्री यात्रा के लिए केले के निर्यात हेतु सागर नयाचार विकसित करने में सफल रहे। फिलीपींस मध्य पूर्व में केले की शिपिंग कर रहा हैजिसमें लगभग 18 दिन लगते हैंजबकि भारत केवल 2-4 दिनों की पारगमन अवधि में इस उत्पाद को भेजने में सक्षम रहा है। पूरे भारत में कार्यनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर किए गए सागर नयाचार का परीक्षण एक तात्कालिक आवश्यकता है जिसे युद्धस्तर पर लिया जाना चाहिए। इससे व्यापार को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी।

 

6.5 सशक्त गुणवत्ता शासन की स्थापना

 

मानकों की स्थापना में एफएसएसएआईईआईसीसंयंत्र और पशु संगरोध और विभिन्न वस्तु बोर्डों की भूमिकाऐसे मानकों को लागू करने और निर्यात योग्य प्रतिष्ठानों की पहचान करने के लिए एक मजबूत प्रत्यायन एवं प्रमाणीकरण व्यवस्था आगे निर्यात की सुविधा प्रदान करेगी।

 

अन्य देशों के एसपीएस और टीबीटी अवरोधों से निपटने में एक `पूर्ण सरकारी दृष्टिकोणके संदर्भ में सुविधा भी बाजार पहुंच की गति को तेज करेगी और साथ ही उन देशों के संबंध में उपायों को भी देखेगी जो अनुचित बाधाएं डाल रहे हैं।

 

एक सशक्त गुणवत्ता शासन स्थापित करने की दिशा में भारत के प्रयास के एक भाग के रूप मेंसशक्त आरएंडडीनई किस्मोंअत्याधुनिक प्रयोगशाला और प्रभावी मान्यता एवं निगरानी के लिए एक प्रयोगशाला नेटवर्किंग प्रक्रिया पर जोर दिया जाएगा।

 

6.5 कघरेलू और निर्यात बाजार के लिए एकल आपूर्ति श्रृंखला और मानकों को स्थापित करना एवं बनाए रखना:

 

संधारणीय आधार पर निर्यात आदेश प्राप्त करने के लिए मात्रा और गुणवत्ता में स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। घरेलू बाजार के लिए निर्धारित गुणवत्ता मानकों और निर्यात बाजार के लिए निर्धारित नीतियों की समाभिरूपता होनी चाहिए। यह विशेष रूप से असंगठित और बिखरे क्षेत्रों जैसे कि फल और सब्जियांपशुधन और डेयरी के लिए चुनौतीपूर्ण हैजहां चालाकी से बचने के लिए पता करने की क्षमता जारी रहती है। परिणामस्वरूपभारत की कृषि उपज प्रायः आयातक देशों द्वारा निर्धारित मानकों से कम हो जाती है। कृषि परिपाटियों और घरेलू विपणन पर सीमित नियंत्रण भी निहित और प्रतिस्पर्धी हितों को डर और सख्त व्यापार फैलाने की अनुमति देता है। एफएसएसएआई घरेलू बाजार में निर्मित खाद्य पदार्थों के साथ-साथ देश में आयात होने वाले खाद्य उत्पादों के लिए मानक स्थापित करने हेतु जिम्मेदार है। तथापिवाणिज्य विभाग के तहत विभिन्न निकायों द्वारा निर्यात मानक निर्धारित किए गए हैं जो आयातक देशों द्वारा निर्धारित मानकों के परिणाम हैं। उच्च गुणवत्ता वाले आमकेले और काजू का निर्यात किया जाता हैजबकि निम्न मानक और घटिया उपज देश भर के घरेलू बाजार में अपना रास्ता तलाशती है। घरेलू मानकों के सामंजस्य के परिणामस्वरूप उपज की गुणवत्ता में सुधारअच्छी कृषि परिपाटी के संबंध में जागरूकता और निर्यात के लिए लेनदेन की लागत कम होगी।

 

6.5 खएसपीएस और टीबीटी प्रतिक्रिया तंत्र:

 

क) यह सामान्य जानकारी है कि बाजार पहुंच से संबंधित मुद्दे महीनों तक चलते हैंकभी-कभी वर्षों से एक साथ देशों को उत्पादों के लिए बाजार पहुंच की अनुमति मिलती है। टैरिफ बाधाओं के अलावाजो मुक्त व्यापार समझौतों और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के कारण वर्षों से गिरते आ रहे हैंगैर-शुल्क बाधाएं (एनटीबीऔर कड़े गुणवत्ता/पादपस्वच्छता मानक बाजार पहुंच को प्रतिबंधित करने/रोकने के मानक बन रहे हैं। तेजी से सतर्क और चेतावनियों का जवाब देना तथा यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उत्पादकों/प्रसंस्करणकर्ताओं और निर्यातकों के लिए चिंता/ समस्या वाले क्षेत्र ख़त्म हो जाएँ। एक प्रतिक्रिया तंत्र के अभाव मेंअस्थायी प्रतिबंध/प्रतिबंध अधिक होने की संभावना होती है और कभी-कभी प्रतिबंध को हटाने में वर्षों लग सकते हैं।

 

ख) तेजी से सतर्क की प्रतिक्रिया के अलावाबाजार पहुंच प्रयासों को कीट जोखिम विश्लेषणपशु स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम संबंधी डोज़ियर प्रस्तुत करने और आयातक देशों/मांगकर्ता देशों की सुरक्षा चिंताओं को हल करने की आवश्यकता होती है। इन मुद्दों को प्रस्तुत करने/जवाब देने के लिए जिम्मेदार विभागों/एजेंसियों की बहुलता को देखते हुएइसका जवाब देने में असामान्य रूप से लंबा समय लगता हैजिसके परिणामस्वरूप बाजार पहुंच में देरी होती है।

 

ग) खाद्य उत्पादों में अवशेष स्तरप्रयोगशालाओं द्वारा परीक्षण नयाचार और आयातक देशों द्वारा अपनाए गए सहिष्णुता स्तर एक मुद्दा है जिसके संबंध में प्रयासों के समाभिरूपता अपेक्षित है। प्रयोगशालाओं को प्रत्यायन प्रदान करने वाली कई एजेंसियों के बजायआयातक देशों द्वारा निर्धारित सहिष्णुता सीमाओं के अनुसार हमारे परीक्षण करने में उनकी क्षमता के साथ-साथ प्रयोगशालाओं की दक्षता का एक व्यापक मानचित्रणकई प्रत्यायनों की आवश्यकता को कम करेगा। कृषि निर्यात नीति के भाग के रूप मेंवाणिज्य विभाग एक एकल पोर्टल बनाने का प्रस्ताव करता है जो प्रयोगशालाओं के एकल प्रत्यायन के लिए सुविधा प्रदान करेगा और विभिन्न संगठनों को अलग-अलग प्रत्यायन गतिविधियों को करने से रोकेगा। संयुक्त मूल्यांकन और प्रत्यायन के लिए एनएबीएल प्रमुख संगठन होगा। यह चूक के मामले में मूल कारण विश्लेषण की सुविधा भी देगा और निर्यात किए गए उत्पादों के लिए गैर-जिम्मेदार नमूना या परीक्षण तंत्र के मामले में चूककर्ता प्रयोगशालाओं को दंडित करेगा।

 

इसी प्रकारअवशिष्ट निगरानी योजनाओं (आरएमपी) को तैयार करने से क) पता लगाने की क्षमता बनाए रखने के लिए एक ऑनलाइन मंच सृजित करने, ख) परीक्षण नयाचारों का मानकीकरण करके निर्यात की सुविधा प्रदान करने में सहायता मिलेगी। एपीडा ने अंगूर के लिए पहले ही इसकी शुरुआत कर दी है। कृषि निर्यात नीति के भाग के रूप में निर्यात निरीक्षण परिषद द्वारा एक समान पहल देश से निर्यात किए जाने वाले झींगों के लिए प्रस्तावित है। यह प्रयास होगा कि पता लगाने की पहल को जारी रखा जाए और अधिक से अधिक कृषि उत्पादों को अपने दायरे में लाया जाए। किसानों की भागीदारी के माध्यम से पता लगाने योग्य प्रणाली में अपेक्षित विवरणों लेने के लिए एक खाका/कार्यढांचा विकसित किया जाएजिसे राज्य सरकारों की सहायता से कार्यान्वित किया जा सकता है।

 

जो कीटनाशक आयातक देशों द्वारा प्रतिबंधित हैं, उनके आधार पर कभी-कभी भारत में एक नीति उपाय की आवश्यकता हो सकती हैविशेषकर यदिवैकल्पिक कीटनाशक उपलब्ध हों। केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (सीआईबीद्वारा नए कीटनाशकों का पंजीकरणउनके वैज्ञानिक पैनल की सिफारिश के बाद महीनों लग सकते हैं और इसके परिणामस्वरूप कीटनाशकों की प्रबलता होती है जिसे आयातक देशों में प्रतिबंधित किया गया है/अप्रयोज्य पाया गया है। कभी-कभीजो कीटनाशक आयातक देशों में पंजीकृत नहीं होते हैं (उदाहरण के लिए यूरीपोय संघ में ट्राईसाइक्लाज़ोल), उन्हें प्रस्तुत करने के लिए पूर्ण वैज्ञानिक दस्तावेजों की आवश्यकता होती है जिसके लिए सीआईबी को एक सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता होती है।

 

ङ) इसके अतिरिक्त, कृषि और खाद्य उत्पादों के निर्यात अस्वीकार होने की स्थिति मेंएक मूल कारण विश्लेषण करने और ऐसे अस्वीकृति के कारणों की पहचान करने की आवश्यकता है। यूएसएफडीए और यूरोपीय संघ ने अपने वेब पोर्टल में आयात अस्वीकारों को दर्शाने की प्रणाली विकसित की है। कृषि निर्यात नीति के भाग के रूप मेंवाणिज्य विभाग सभी निर्यात अस्वीकारों की निगरानी के लिए एक आम पोर्टल विकसित करने और विभिन्न नोडल एजेंसियों को एक मूल कारण विश्लेषण करने के लिए एक मंच प्रदान करनेसुधारात्मक कार्रवाई करने और आवश्यकता के मामले में की गई कार्रवाई के संबंध में भागीदार देश को जवाब दिए जाने का प्रस्ताव करता है।

 

इस प्रकारउपरोक्त के मद्देनजरवाणिज्य मंत्रालय के तत्वावधान में एक संस्थागत तंत्र बनाने का सुझाव दिया गया है जिसमें संगत मंत्रालयों, भारत के बाजार पहुंच अनुरोध को हल करने के लिए एजेंसियों का प्रतिनिधित्वभारतीय बाजार तक पहुंचने के लिए इसे व्यापारिक साझेदार के बाजार पहुंच अनुरोध जांचने और एसपीएस/टीबीटी बाधाओं का शीघ्रता से उत्तर देना शामिल है। उपरोक्त संस्थागत तंत्र का जनादेश निम्नलिखित क्षेत्रों पर दिखेगा:

 

  1.  बाजार पहुंच से संबंधित मुद्देअर्थात कीट जोखिम विश्लेषणखाद्य उत्पादों का जोखिम मूल्यांकनपशु रोग नियंत्रण कार्यक्रमों से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करनानए बाजारों तक पहुंचने के लिए प्रयास और संबंधित एजेंसियों द्वारा उठाए गए कदम आदि।

 

  1.   एनटीबी के सामने आ रही भारतीय कृषिसमुद्री और प्रसंस्कृत उत्पादों (चायकॉफीमसाले सहित) और एनटीबी पर काबू पाने के लिए कार्यनीतियां। एनपीपीओईआईसीएपीडाएमपीईडीए जैसे अन्य निर्यात संवर्धन निकायों को आवश्यकताएं लाने और बैठकों के बीच की गई प्रगति दर्शाने की आवश्यकता है।

 

  1.   विभिन्न उत्पादों के लिए निर्यात-पूर्व निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण के लिए हमारी ताकत/क्षमता की स्थितिअंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम परिपाटियों के साथ हमारी प्रयोगशाला और अन्य निर्यात-पूर्व अवसंरचना को लाने के लिए अंतराल और रोडमैप की पहचान करना।
  2.   ऑनलाइन लेनदेन के लिए पहलयह सुनिश्चित करना कि विभिन्न एजेंसियों द्वारा विकसित प्रणालियांअर्थात सीमा शुल्क के आईसीईजीएटीईडीजीएफटी के सॉफ्टवेयरनिर्यात विकास प्राधिकरण के सॉफ्टवेयर एक-दूसरे को सूचना देते हैं और निर्यातकों के लिए व्यापार करने में आसानी के रूप में कागज के काम को कम करते हैं।

 

(v)   राष्ट्रीय मानकों से संबंधित निर्यातकों की चिंताओं को हल करनाइसका कोडेक्स या    अन्य अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ सामंजस्य बनानाएफएसएसएआई द्वारा सामग्री की आयात मंजूरीशीघ्रता से निर्यात/आयात मंजूरी के लिए जोखिम आधारित निरीक्षण/ग्राहक प्रत्यायन प्रणाली पर भी इस मंच में चर्चा की जा सकती है।

 

6.5 ग. अनुरूपता मूल्यांकन: कई आयातक देश भारत के निर्यात निरीक्षण और नियंत्रण प्रक्रियाओं को नहीं मानते। भारतीय परीक्षण प्रक्रियाओं और अनुरूपता मानकों की मान्यता का अभाव निर्यातकों और इसलिए किसानों के लिए महंगा सिद्ध होता है। कई बार इसका मतलब देश भर की विभिन्न प्रयोगशालाओं द्वारा परीक्षण की बहुलता तथा दोहरापन होता है। मसालेजैविक खाद्यबासमती उत्पाद इससे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। समान रूप सेसरकार को जातीय और जैविक उत्पादों एवं मानकों की पारस्परिक मान्यता के लिए द्विपक्षीय चर्चा के दौरान ठोस प्रयास करने चाहिए। ईआईसी, एपीडा, एमपीईडीए, मसाला बोर्ड इत्यादि कृषि निर्यातों के सुचारु निर्यात के लिए मान्यता हेतु अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रिया के लिए प्रयास करना जारी रखेंगे।

 

6.6 अनुसंधान और विकास

हितधारकों ने अक्सर निर्यातोन्मुख उत्पाद विकास और पहचान की गई वस्तुओं की गुणवत्ता के परीक्षण के लिए संसाधनों की पहचान और उपयोग करने की आवश्यकता की सिफारिश की है। कृषि उत्पादों की कुछ किस्मों में बेहतर जर्मप्लाज्म आयात करने की भी आवश्यकता है। आर एंड डी क्षेत्र में अपेक्षित मध्यस्थताओं संबंधी सुझाव हितधारकों से वित्तीय प्रभाव निर्धारित करने के लिए मांगे जाएंगे।

 

कृषि अनुसंधान और विकास (आरएंडडीनिजी उद्योग के नेतृत्व में सरकार द्वारा उच्च अवसंरचना के खर्च के साथ कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण होगा। दशकों पहलेभारतीय कृषि अनुसंधान एवं विकास ने हरित और श्वेत क्रांति के साथ कई बातें देखीं। तब सेअनाज ने बागवानी फसलों की तुलना में क्षेत्र में और प्रयोगशाला में उच्च आवंटन का आनंद लिया है। निर्यात स्तर परपूसा बासमती 1121 संभवतः भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरईद्वारा प्रशंसा और विदेशी मुद्रा लेने के लिए सफल घरेलू अनुसंधान का एक अच्छा उदाहरण हैबासमती निर्यात उद्योग 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से कम था, जो यह उद्योग शुरू होने पर चौगुना होकर 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक हो गया है।

 

इसके साथ हीपैकेजिंग में नवाचारोंउत्पादों के शेल्फ जीवनकाल में सुधार और आयातक देशों के अनुरूप उत्पादों को विकसित करने में बेहतर आरएंडडी की प्राथमिकता होगी। भारतीय पैकेजिंग संस्थान सहित वाणिज्य विभाग के अंतर्गत स्वायत्त निकाय इस दिशा में हितधारकोंएमओएफपीआई, आईसीएएआरवैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआरऔर राज्य सरकारों के साथ काम करेंगे। निर्यातोन्मुख उत्पादन के बारे में सूचना के प्रसार के लिए प्रौद्योगिकी अंतरण और विस्तार सेवाओं के लिए एक कुशल संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है।

 

  • निर्यातोन्मुख जर्मप्लाज्म आयात करना

बीज विकास और व्यावसायीकरण में लंबी अवधि वास्तव में उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक महंगी बाधा है। निजी क्षेत्र ने बौद्धिक संपदा (आईपी) अधिकारों के पर्याप्त विनियमन और संरक्षण की कथित कमी के कारण प्रौद्योगिकी अंतरण में आशंका दर्शाई है। यह प्रस्तावित किया गया है कि केंद्र सरकार एक कोष का गठन करे जो दुनिया भर में प्रजनकों से अभिज्ञात निर्यात योग्य फसलों के जर्मप्लाज्म और बीज किस्मों के आयात के लिए अनुरूप निधि के रूप में कार्य करेगा। आईसीएआरएपीडामसाला बोर्डएमपीईडीए आदि और निजी उद्योग प्रमुख हितधारक होने चाहिए। प्रत्येक केंद्रित फ़सल/उत्पाद के लिएपशुओं और जलीय कृषि जर्मप्लाज्म वार्ताएं प्रमुख निर्यातकों के साथ की जानी चाहिएंताकि विविध आयात में निजी योगदान के अनुरूप अनुदान प्रदान करने के लिए एक तंत्र तैयार किया जा सके। निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए आईपी अधिकारों को बेहतर ढंग से लागू करना सुनिश्चित करना सरकार के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होगा।

 

  • निर्यातकों का सुझाव है कि ऐसी पेंटेंटयुक्त रंगीन/शेल्फ-थिनिंग अंगूर किस्मों का आयात किए जाने की आवश्यकता है जिनकी अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में मांग हो।
  • नई-नई सफल भारतीय अंगूर की किस्में जैसे नाना बैंगनीकृष्णा बीज रहित (काला बीज रहित) और सुपर सोनाकामणिकचमनएसएसआरके (सफेद बीज रहित किस्में)जो मध्य पूर्व में लोकप्रिय हैंको औपचारिक रूप से मान्यता दिए जाने की आवश्यकता हैजिन्हें फसल के बाद नयाचारों की स्थापना में पंजीकृत किए जाने की आवश्यकता है।
  • बेहतर गुणवत्ता और लंबे जीवनकाल के लिए आलू के बीज को बेहतर बनाना (जैसे हॉलैंड मूल)
  • यूरोपीय संघ को निर्यात के लिए लहसुन और सफेद प्याज की कम तीखी किस्मों का आयात करना
  • भारत में उगाए जाने वाले औसतन 300 ग्राम आकार वाले फल के मुकाबले 500 ग्राम आकार की अंतर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत अनार की किस्में आयात की जानी चाहिए।

 

  • जैविक उत्पादों के निर्यात को सहायता देने के लिए उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में मजबूत अवसंरचना वाली परीक्षण प्रयोगशालाएं

सिंगल-माइंडेड निर्यात समूह पर जोर देकर, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में निर्यात योग्य जैविक उत्पाद के उत्पादन की क्षमता है। मसाला निर्यातकों ने विशेष रूप से इस क्षेत्र में उगाई जाने वाली जैविक/ गैर-जैविक उच्च गुणवत्ता वाली हल्दीअदरक और काली मिर्च में रुचि दिखाई है। इसके लिए निर्यात/आयात किए जाने वाले उत्पादों के लिए अत्याधुनिक परीक्षण और प्रमाणन प्रयोगशालाओं की स्थापना की आवश्यकता होगी। वर्तमान मेंउत्पादन को कोलकाता में परीक्षण के लिए भेजा जाता है जो तार्किक रूप से चुनौतीपूर्ण है और महंगा साबित होता है। हितधारकों द्वारा यह प्रस्तावित किया गया है कि विशेष रूप से मसालों के परीक्षण के लिए गुवाहाटी में एक एनएबीएल प्रत्यायित प्रयोगशाला स्थापित की जाए। गुवाहाटी हवाई अड्डे पर भंडारण और सार-संभाल अवसंरचना के उन्नयन के लिए उपर्युक्त सिफारिश इस उपाय की पूरक होगी।

 

इसके अलावाअगरतला में अकहुराकरीमगंज में सुतारकंडीमेघालय में डोकीमणिपुर में मोरेह और मिजोरम में ज़ोखावथर में संयंत्र संगरोध और परीक्षण प्रयोगशालाएँ स्थापित करने की व्यवहार्यता तैयार की जानी चाहिए। यह म्यांमार के रास्ते से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए इन स्टेशनों पर अनौपचारिक व्यापार को बढ़ावा देने और विनियमित करने में मदद करेगा।

 

6.7 विविध

 

 

6.7 क - कृषि-स्टार्ट-अप निधि का सृजन: स्थापना के शुरुआती समय में कृषि उत्पादों के निर्यात में एक नया उद्यम शुरू करने के लिए उद्यमियों की सहायता की जानी है। कृषि निर्यात क्षेत्र में एक स्टार्ट-अपजो एक नई संकल्पना/उत्पाद/परियोजना पर कार्य करने जा रहा है, अपने प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकता है। इस तरह के सभी प्रस्तावों को उनके मूल्यांकन के लिए निधि प्रबंधक को भेजा जाएगा और वे उन योग्य प्रस्तावों के लिए धन उपलब्ध कराएंगे जो देश से कृषि निर्यात बढ़ाने में सहायक हों। उदाहरण के लिए सटीक कृषिपादप स्वास्थ्य निगरानी,सटीक कृषि के लिए ड्रोन का उपयोगपैकेजिंगपारगमन में उपज की ट्रैकिंग सहित कृषि मूल्य श्रृंखला में आईटी के उपयोग के लिए निधि की सहायता दी जा सकती है।

 

 

निष्कर्ष

 

इस नीति का उद्देश्य उन सभी मुद्दों को हल करना है जो भारत को कृषि निर्यात के शीर्ष वर्ग में संभावित रूप से आगे बढ़ा सकते हैं। प्रायः यह माना गया है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखला में एकीकरण उत्पादकता लाभ और लागत प्रतिस्पर्धा प्राप्त करने के साथ-साथ सर्वोत्तम कृषि परिपाटियों को अपनाने के सबसे निश्चित पद्धतियों में से एक है। किसान की आय को दोगुना करने के उद्देश्य से उच्च स्तर की आय के साथ-साथ खाद्य मूल्य श्रृंखला में सुधार की आवश्यकता होगी।